Thursday, September 17, 2015

राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है, हिन्दी

वसुधैव कुटुम्बकम की भावना की अलख जलाती हमारी हिन्दी भाषा, दक्षिण से उत्तर तक तथा पश्चिम से पूरब तक  राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।  परंतु भारत की आजादी के 68 वर्ष बाद भी हिन्दी भाषा को लेकर कई राज्यों में विवाद चल रहा है जबकि संविधान के अनुसार 14 सितंबर 1949 को अनुछेद 343 एक  के अनुसार  हिन्दी को राजभाषा घोषित किया गया तथा ये 26 जनवरी 1950  से अधिकारिक तौर पर बोली जाने वाली भाषा बन गई।  संवेधानिक दर्जा प्राप्त हिन्दी को अभी भी  यदा-कदा अग्नि परिक्षा से गुजरना पङता है। विश्व स्तर पर अग्रसर हिन्दी अपने ही देश में अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है।

संत कनफ्यूशियस के अनुसार, "अपनी भाषा हीन होने से कोई देश आजाद नही रह सकता।" 

संविधान के अनुसार हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है और हम 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की दासता से आजाद भी हो गये। अंग्रेज भारत छोङकर चले भी गये किन्तु उनकी अंग्रेजी के हम अभी भी गुलाम हैं। स्वतंत्रता के संघर्ष में जनमानस की भाषा, गाँधी, टैगोर, तिलक, दयानंद सरस्वति, एवं सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित्व वाले लोगों की भाषा हिन्दी को आज भी वो स्थान नही मिल सका जिसकी वो हकदार है। ये अजीब विडंबना  है कि आजादी के साठ दशक बाद भी स्वंय सिद्धा हिन्दी पूर्णतः सरकारी काम-काज की भाषा का सम्मान न पा सकी।

महात्मा गाँधी ने कहा था कि, "राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है।" 

इतिहास गवाह है कि, हमारे कई मुस्लिम शासकों ने हिन्दी को अपने कामकाज की भाषा माना था। मौहम्द गौरी ने अपने राजकीय काम-काज को देवनागिरी तथा हिन्दी में संपादित करने के आदेश दिये थे। उसने सिक्कों पर देवानागीरि में 'श्री हम्मी तथा मेहमूद साँब' अंकित करवाया था। शेरशाँह सूरी ने भी अपने शासन काल में सिक्कों पर देवनागिरी में 'श्री हम्पी तथा ऊँ' अंकित करवाया था। उनके शासन काल में परोक्ष तथा अपरोक्ष रूप से शासन का कार्य हिन्दी में किया जाता था। 18वीं शताब्दी में पेशवा, सिंधिया और होलकर जैसे मराठी राजघरानो में हिन्दी में ही कामकाज होता था। अनेक संतो जैसे नामदेव, चैतन्य महा प्रभु, गुरु नानक ने अपने उपदेश हिन्दी में दिये थे क्योकि हिन्दी जन-साधारण की भाषा थी। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, हिन्दी भाषा प्राचीन काल से सभी प्रान्तों को एक दूसरे से जोङे हुए है। आजादी का संदेश लिये हिन्दी भाषा ने सभी देशभक्तों को एक सूत्र में बाँधा था। 

दयानंद सरस्वती ने कहा था कि, "हिन्दी ही राष्ट्रीय एकता को शास्वत और अक्षुणं बना सकती है।"

एक सर्वे के अनुसार 24 प्रतिशत साक्षर लोगों में से केवल दो प्रतिशत ही लोग अंग्रेजी जानते हैं क्योंकि अंग्रेजी में नरेशन की दिक्कत है जबकि हिन्दी नरेशन की बला से मुक्त है। हमारी हिन्दी भाषा में बङों का सम्मान लिए 'आप' जैसे शब्द है, जबकि अंग्रेजी ने तो सभी को एक ही शब्द 'यू' (You)  के साँचे में कैद कर दिया है। समय के बंधनो से मुक्त हिन्दी भाषा में हमारी अभिवादन शैली, प्रणाम और नमस्कार नम्रता का प्रतीक है। हिन्दी समृद्ध और सर्वग्राही भाषा है। 

आचार्य केशवचन्द्र सेन के अनुसार, "भारत जैसे देश में जहाँ अनेक बोलियां बोली जाती हैं वहाँ हिन्दी ही सम्पर्क, सर्वसुलभ ओर सार्वभौमिक भाषा सिद्ध होती है। ये राष्ट्रीय एकता और अखंडता की प्रतीक है।" 

आजादी से पूर्व हम सब एक भाषा हिन्दी के साथ, एक उद्देश्य के लिए अंग्रेजों के खिलाफ थे, परंतु आज के परिवेश में कुछ राजनैतिक गतिविधियों ने भारत को अनेक राज्यों में बाँट दिया है, वहाँ की क्षेत्रिय भाषाएं अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगी हैं। आज जिसे देखो वो अपने को पहले पंजाबी, बंगाली, मराठी, कन्नण, मद्रासी आदि कहते हुए मिल जायेगा, बहुत कम ही लोग स्वंय को भारतवासी या हिन्दुस्तानी कहते हुए मिलते हैं। भाषाई विवाद का ही परिणाम है, अनेक राज्यों का स्वतंत्र उदय।मित्रों, भाषा पर कुठाराघात किसी भी राष्ट्र के लिए हितकर नही होता और राष्ट्र से बढकर किसी भी भाषा का कोई स्वाभीमान नहीं होता।  

भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ के लिए कहा जाता है कि चार कोस पर भाषा बदले छः कोस पर पानी, वहाँ सभी को एक सूत्र में बाँधना आसान नही है किन्तु सभी भाषाओं का मिश्रित रूप और संतो की वाणी से अलंकृत संवेधानिक भाषा हिन्दी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाये रखने में सक्षम है क्योंकि हिन्दी भाषा सद्भावना, प्रेम, श्रद्धा तथा अहिंसा, करुणा एवं विश्व मैत्री का प्रतीक है। 

वर्तमान में गूगल जैसे सर्चइंजन भी हिन्दी के विकास को समझते हुए अपनी कार्य प्रणाली को हिन्दी में भी उपलब्ध करा रहे हैं। हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने को भी अग्रसर है। अतः मित्रों विश्व स्तर पर अपना वर्चस्व रखने वाली हिन्दी भाषा को हम सब मिलकर वैश्विक मानचित्र पर नम्बर एक पर ले जाने का प्रयास करें और गर्व से हिन्दी भाषा को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनायें। 



ए.पी.जे.कलाम और ह्वीलर द्वीप




मित्रों, अभी हाल में ही उड़ीसा सरकार ने ह्वीलर द्वीप का नाम हम सबके प्रिय अब्दुल कलाम साहब के नाम कर दिया है। उनके सम्मान में ये कदम बहुत प्रशंसनिय है। ह्वीलर द्वीप से कलाम साहब का क्या नाता रहा है?  इसके बारे में आप सबसे कलाम साहब के संस्मरण को साझां करना चाहेंगे, जो उन्होने अपनी पुस्तक टर्निंग प्वाइंट में उल्लेखित किया है। 

मिसाइल मैन अब्दुल कलाम साहब अपनी पुस्तक में  जिक्र करते हैं कि, 'ये उन दिनों की बात है जब पृथ्वी मिसाइल का सफल परिक्षण हुआ था।इसी के साथ सेना की एक और जरूरत सामने आई जिसमें उन्हे जमीनी क्षेत्र के लिये एक आधुनिक यंत्र की आवश्यकता थी। जिसके लिये हम लोग जिस मरुस्थली क्षेत्र में अपने परिक्षण कर रहे थे, वह सुरक्षा व अन्य कारणों से उपयुक्त नही था। हमें अपने इस काम के लिये पूर्वी तटिय क्षेत्र के किसी निर्जन द्वीप की जरूरत थी।


भू जलीय नक्शे में हमें उड़ीसा तट पर कुछ निर्जन द्वीप नजर आये। वहाँ भू भागों की सम्भावना थी। हम अपनी टीम जिसमें  डॉ़ एस.के.सलवन तथा डॉ. वी.के. सारस्वत शामिल थे। धमरा से एक नौका किराये पर ली गई और हम सब द्वीप की तलाश में निकल पड़े। नक्शे पर इन द्वीपों के संकेत 'लौंग ह्वीलर', 'कोकोनट ह्विलर' और 'स्मॉल ह्विलर' के नाम से लिखे हुए थे। टीम ने एक कमपास( दिशासूचक यंत्र) लिया और यात्रा पर निकल पड़े। टीम रास्ता भटक गई उसे ह्वीलर द्वीप नही मिला लेकिन सौभाग्य से , उन्हे कुछ मछुआरे अपनी नौकाओं में दिखे। उनसे रास्ता पूछा गया। उन मछुआरों को ह्वीलर द्वीप का  तो पता नही था लेकिन उन्होने चन्द्रचूड़ नाम के एक द्वीप का जिक्र किया। मछुआरों ने सोचा कि ये लोग इसी द्वीप का पता पूछ रहे हैं। उन्होने चंद्रचूड़ द्वीप का पता बता दिया। उनके बताये हुए  रास्ते से टीम चंद्रचूड़ पहुंची और बाद में पता चला कि वही स्मॉल द्वीप है और वहाँ हमारी जरूरत भर जगह पर्याप्त है।

उस द्वीप को पाने के लिये हमें उड़िसा नौकरशाही का सामना करना पड़ा। यह जरूरी हुआ कि इसके लिये उड़िसा के तत्कालीन (1993) मुख्यमंत्री से राजनितिक निर्णय पाया जाये। उस समय शक्ति सम्पन्न नेता बीजू पटनायक मुख्यमंत्री थे। उनके कार्यालय से संकेत मिल रहा था कि वह द्वीप किन्ही कारणों से उपलब्ध नही हो पायेगा। खैर हमारी विनय स्वरूप हमें बीजू पटनायक से भेंट करने का अवसर मिला। जब हम उनके कार्यालय में पहुँचे तो फाइल उनके सामने रखी हुई थी। उन्होने कहा, 'कलाम, मैने ये पाँचो द्वीप डी.आर.डी.ओ. को बिना किसी किमत के देने का फैसला लिया है, लेकिन मैं इस फाइल पर अपनी स्वकृति हस्ताक्षर तभी करुंगा जब तुम्हारी ओर से  एक वादा किया जायेगा। उन्होने मेरा हाँथ अपने हाँथ में थाम कर कहा, ' तुम्हे एक मिसाइल ऐसी बनानी पड़ेगी जो दूर के दुश्मनों से भी हमारी रक्षा कर सके'। मैने कहा, 'सर, हम जरूर इसपर काम करेंगे। मैने तुरंत रक्षा मंत्री को सूचना दी। मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर होने के बाद हमें स्मॉल द्वीप मिल गया।
  
पाठकों इस प्रकार कलाम साहब के अनुरोध पर ये द्वीप डी.आर.डी.ओ. को रॉकेट प्रक्षेपण के लिये उपलब्ध हो सका। उनके महत्वपूर्ण प्रयासों से आज ये द्वीप विश्व के महान प्रक्षेपात्रों में शामिल है।

2 दिसंबर 2014 को परमाणु सक्षम अग्नी IV मिसाइल का परिक्षण उङीसा के ह्वीलर द्वीप के एकीकृत परिक्षंण रेंज से किया गया था। नि:संदेह ह्विलर द्वीप का नाम 'कलाम द्वीप' हो जाने से देश के युवाओं और वैज्ञानिकों को प्रेरणा मिलेगी।

आज के बालक भारत का भविष्य हैं


मित्रो, जिस तरह से आज समाज में बाल अपराध बढ रहे हैं और नाबालिग बच्चे, ऐसे जघन्य अपराध को अंजाम दे रहे हैं, वो  किसी भी सभ्य समाज के लिये कलंक से कम नही है। आज के वातावरण को देखते हुए किशोर न्याय अधिनियम 2014 संशोधन बिल पर कैबिनेट की मोहर एक सार्थक कदम है। पिछले कुछ वर्षों से नाबालिग बच्चों द्वारा हत्या, दुश्कर्म तथा तेजाबी हमले तेज हुए हैं लेकिन उन्हे पुराने अधिनियम के अनुसार सख्त सजा का प्रावधान नही था जिससे अपराधिक मानसिकता की प्रवृत्ति ने निर्भया जैसी घटना को अंजाम दिया। आज भी देश निर्भया कांड को याद करके सिहर जाता है। आठवीं में पढने वाला बालक अपनी शिक्षिका की रिवाल्वर से हत्या कर देता है तो कहीं 10 से 12 वर्ष के बालक अपने साथी का अपहरण करके उसकी हत्या कर देते हैं। पिछले कुछ वर्षों से तो,  लङकियों और महिलाओं पर नाबालिग किशोरों द्वारा तेजाबी मानसिकता का कहर कुछ ज्यादा ही हो रहा है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि, किसी भी अपराध की सजा उसकी जघन्यता के आधार पर होनी चाहिये न की उम्र या लिंग के आधार पर । जिस दिन जे जे एक्ट संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लग जायेगी उस दिन से शायद इस तरह के अपराध में कमी आयेगी।

दोस्तों, मेरे मन में बाल अपराध को लेकर कुछ मंथन चल रहा है इसलिये मैने अपनी पूर्व की लाइन में शायद शब्द का इस्तमाल किया है क्योंकि ये जो बाल अपराध का ग्राफ दिन-प्रतिदिन बढ रहा है, उसके लिये जिम्मेदार क्या सिर्फ नाबालिग बच्चे हैं ! या समाज और परिवार भी। आज हम सब एक सभ्य सुंदर और सुसंस्कृत भारत की कल्पना करते हैं।  सुरक्षित वातावरण की भी कामना रखते हैं किन्तु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को दरकिनार कर देते हैं। मेरा मानना है कि, कोई भी शिशु जन्म से अपराधी नही होता उसके लिये अनेक कारण समाज में विद्यमान हैं। हमारा कानून भी इस बात को मानता है कि,  बालकों में बढ रही अपराधिक मनोवृत्ति के पीछे सामाजिक ढांचा भी जिम्मेदार है। आज तो आलम ये हो गया है कि, संभ्रान्त परिवार के बालक भी अनेक अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। किसी भी समाज की पहली ईकाइ होती है परिवार जहाँ बालक का प्रारंभिक विकास होता है। आज-कल अक्सर  देखने को मिल रहा है कि, बच्चे की परवरिश बहुत आधुनिक ढंग से हो रही है। वास्तव में (Actully) आधुनिकता गलत नही है बल्कि आधुनिकता का अधुरा ज्ञान दिमक की तरह समाज को खोखला कर रहा है। आज बच्चों के हाँथ में इंटरनेट से सुसज्जित मोबाइल, आई पेड और स्कूल जाने  के लिये बाइक या कार कानूनी उम्र सीमा से पहले ही परिवार द्वारा मिल जाती है। यदि स्कूल या ट्राफिक नियम इसे रोकते हैं तो परिवार द्वारा हर्जाना भर दिया जाता है। ऐसे ही छोटे-छोटे अपराधों को कई परिवारों का सपोर्ट मिलता है और बच्चों का कानून से डर खत्म हो जाता है। इसके अलावा समाज में व्याप्त फिल्मों तथा विज्ञापनों का खुलापन एक नासूर की तरह अपरिपक्व बच्चों को डस रहा है। जिसका परिणाम आज का बढता बाल-अपराध है। यदि शुरुवात में ही छोटे-छोटे अपराधों को अभिभावकों द्वारा रोका जाए तो एक हद तक बच्चों में सुधार लाया जा सकता है। 

आज के बालक  हमारे भारत देश का भविष्य हैं। अतः हम सबको मिलकर भविष्य के कर्णधार की नींव को सुसंस्कारों से पल्लवित करना है। बाल्यकाल की गलतियों को बढावा देने की बजाय समय रहते ही उसे सुधारना हम सबकी नैतिक और आवश्यक जिम्मेदारी है।

Children are like different type of flowers, So irrigate them good manners and make this world a beautiful garden