Tuesday, November 25, 2014

बुझी मोमबत्ती

एक पिता अपनी चार वर्षीय बेटी मिनी से बहुत प्रेम करता था। ऑफिस से लौटते वक़्त वह रोज़ उसके लिए तरह-तरह के खिलौने और खाने-पीने की चीजें लाता था। बेटी भी अपने पिता से बहुत लगाव रखती थी और हमेशा अपनी तोतली आवाज़ में पापा-पापा कह कर पुकारा करती थी।
Heart touching story in Hindi
दिन अच्छे बीत रहे थे की अचानक एक दिन मिनी को बहुत तेज बुखार हुआ, सभी घबरा गए , वे दौड़े भागे डॉक्टर के पास गए , पर वहां ले जाते-ले जाते मिनी की मृत्यु हो गयी।
परिवार पे तो महान पहाड़ ही टूट पड़ा और पिता की हालत तो मृत व्यक्ति के सामान हो गयी। मिनी के जाने के हफ़्तों बाद भी वे ना किसी से बोलते ना बात करते…बस रोते ही रहते। यहाँ तक की उन्होंने ऑफिस जाना भी छोड़ दिया और घर से निकलना भी बंद कर दिया।
आस-पड़ोस के लोगों और नाते-रिश्तेदारों ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की पर वे किसी की ना सुनते , उनके मुख से बस एक ही शब्द निकलता … मिनी !
एक दिन ऐसे ही मिनी के बारे में सोचते-सोचते उनकी आँख लग गयी और उन्हें एक स्वप्न आया।
उन्होंने देखा कि स्वर्ग में सैकड़ों बच्चियां परी बन कर घूम रही हैं, सभी सफ़ेद पोशाकें पहने हुए हैं और हाथ में मोमबत्ती ले कर चल रही हैं। तभी उन्हें मिनी भी दिखाई दी।
उसे देखते ही पिता बोले , ” मिनी , मेरी प्यारी बच्ची , सभी परियों की मोमबत्तियां जल रही हैं, पर तुम्हारी बुझी क्यों हैं , तुम इसे जला क्यों नहीं लेती ?”
मिनी बोली, ” पापा, मैं तो बार-बार मोमबत्ती जलाती हूँ , पर आप इतना रोते हो कि आपके आंसुओं से मेरी मोमबत्ती बुझ जाती है….”
ये सुनते ही पिता की नींद टूट गयी। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया , वे समझ गए की उनके इस तरह दुखी रहने से उनकी बेटी भी खुश नहीं रह सकती , और वह पुनः सामान्य जीवन की तरफ बढ़ने लगे।
मित्रों, किसी करीबी के जाने का ग़म शब्दों से बयान नहीं किया जा सकता। पर कहीं ना कहीं हमें अपने आप को मजबूत करना होता है और अपनी जिम्मेदारियों को निभाना होता है। और शायद ऐसा करना ही मरने वाले की आत्मा को शांति देता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो हमसे प्रेम करते हैं वे हमे खुश ही देखना चाहते हैं , अपने जाने के बाद भी…!

Sunday, November 9, 2014

रुढीवादी सोच को अलविदा कहें



10 जुलाई को 2014 के आम बजट में वित्तमंत्री ने घोषङा की कि, 100 करोङ रूपये बेटी बचाओ, बेटी पढाओ पर खर्च किया जायेगा। 10 जुलाई को ही केन्द्र सरकार सी सबसे छोटी ईकाइ ग्राम पंचायत ने ऐसा तुगलकी फरमान जारी किया कि इंसानियत भी शर्मसार हो गई। करोङों की योजनाओं को ग्राम पंचायत के संवेदनाहीन फैसले ने धज्जियां उङा दी। साल दर साल योजनाएं बनती हैं, ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नही है 2013 को ही देखें निर्भया कांड में अनेक आन्दोलन हुए। सरकार द्वारा बेटीयों की सुरक्षा हेतु निर्भया कोष भी बनाया गया। आज देश में ही नही पूरे विश्व में नारी सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है जिसके मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कई योजनाएं शुरू की। महिलाओं के सम्मान और उनके संरक्षण हेतु देश के पहले एकीकृत संकट समाधान केन्द्र 'गौरवी' का 16 जून 2014 को भोपाल में आरंभ हुआ। फिर भी NCRB ( National Crime Records Bureau) के अनुसार भारत में  प्रतिदिन 93 महिला हैवानियत का शिकार होती है। मन में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतनी सजगता के बावजूद आज बेटीयां सुरक्षित क्यों नही हैं????????????

भारत भूमी पर कहा जाता है कि,  "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"  यहाँ तो कन्या को देवी मानकर नौ दिन पूजा भी की जाती है। विचार किजीए फिर भी  महिलाओं और बेटीयों के प्रति अभद्रता क्यों ??

सुरक्षा, इंसाफ, न्याय, योजनाएं ये सिर्फ शब्द मात्र हैं ज़मीनी हकीकत तो ये है कि आज हमारा समाज मानवता से परे संवेदनाहीन नजर आ  रहा है। सरे आम बेटीयों के साथ बदसलुकी और तमाशबीन बेबस लाचार समाज सिर्फ मूकदर्शक रह गया है। हमारी मानवीय सामाजिक सोच को जैसे लकवा मार गया है।

मित्रों मेरा मानना है कि, 

कैंसर से भी गम्भीर बिमारी से ग्रसित हमारी दकियानुसी रुढीवादी सोच का कुठाराघात बेटीयों पर जन्म से ही होने लगता है। अनेक जगहों की प्रथा के अनुसार बेटा होने पर उसका स्वागत थालियों, शंख तथा ढोल बजाकर करते हैं वही बेटी के जन्म पर ऐसा सन्नाटा जैसे कोई मातम मनाया जा रहा हो। ऐसी बेमेल धार्मिक परंपराएं जहाँ माताएं बेटे की लंबी उम्र के लिए उपवास और धार्मिक अनुष्ठान करती हैं वहीं बेटी की खुशहाली या लंबी उम्र के लिए कोई व्रत या अनुष्ठान नही होता। जन्म से ही भेद-भाव का असर दिखने लगता है बेटीयों को उपेक्षित तथा बेटों को आसमान पर बैठा दिया जाता है। भेद-भाव का बीज हम सब बोते हैं और बाद में चाहें कि बेटा बेटी का सम्मान करे ये क्या स्वाभाविक हो सकता है ! जब बीज ही असमानता को बोयेंगे तो फल समानता का कैसे मिलेगा।

सोचिए ! जिस दुनिया में बेटीयों को जन्म लेते ही पक्षपात का शिकार होना पङता हो वहाँ बेटीयाँ कितनी भी काबिल हों जाएं उन्हे लङकों से कमतर ही माना जायेगा क्योंकि हमारी बुनियादी सोच ही दोहरी मानसिकता के साथ फल-फूल रही है। आज भी अनेक परिवारों में भले ही लङकी डॉक्टर या इंजिनीयर हो वो लङके से ज्यादा कमाती हो फिर भी उसे सुन्दरता और दहेज की कसौटी पर कसा जाता है। विवाह के लिए लङके वालों के समक्ष नुमाईश की तरह पेश किया जाता है, जहाँ पसंद नापसंद का अधिकार लङकों को दिया जाता है। हमारी विषाक्त सामाजिक सोच से लङके को शंहशाह बना दिया जाता है वो जो चाहे कर सकता है। जिसका असर 21वी सदी के भारत पर भी छाया हुआ है। आज भी पुरूष प्रधान समाज की तूती बजती है, जहाँ 5 साल की बच्ची हो या 50 साल की महिला कोई सुरक्षित नही है। 

समाज का लगभग आधा भाग यानि की स्त्री वर्ग की भूमिका को भी अनदेखा नही किया जा सकता। हमारी माताओं की भी जिम्मेदारी है बेटीयों को भेद-भाव मुक्त समाज देने की किन्तु कई बार वो स्वयं ही इस दकियानुसी सोच का हिस्सा होती हैं। कहते हैं कि, औरत ही औरत की दुश्मन होती है। इस बात की गहराई हाल ही में घटी बोकारो की घटना से समझी जा सकती है।   10 जुलाई को झारखंड के बोकारो की एक ग्राम पंचायत के तुगलकी  फरमान  को  यथावत एक महिला ने ही आगे बढाया। सोचकर ही मन सिहर जाता है कि 10 साल की बच्ची को एक महिला ने ही हैवानियत की अग्नी में कैसे ढकेल दिया ! 

यदि हमें स्वस्थ भारत और बेटीयों के लिए भयमुक्त भारत बनाना है तो समाज में बेटीयों का सम्मान जन्म से ही होना चाहिए। सामाजिक ढांचे के सभी पहलुओं पर संजीदगी से विचार करना चाहिए। जहाँ स्त्री को केवल एक उपभोग की वस्तु ही समझा जाता है, ऐसे माध्यमों पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए। नारी को बाजारवाद की वस्तु न मानकर उसे भी समाज का सम्मानित हिस्सा मानना चाहिए। स्वस्थ समाज के लिए मनोरंजन की आङ में फैल रहे अश्लील कार्यक्रमों और विज्ञापनों को कठोर कानून से बन्द करना भी एक आवश्यक कदम है। विकास का मतलब ये कदापी नही है कि हम पाश्चात्य के खुलेपन को भी स्वीकारें। समाज में जागरुकता से  पक्षपात की अमानवीय सोच को समाप्त किया जा सकता है। 

रूढीवादी विषाक्त सोच भले ही आज सुरासा के मुहँ की तरह है फिर भी उसका अन्त किया जा सकता है। यदि समाज के दोनों आधार स्तंभ (नर और नारी )  मिलकर बेटी और बेटा को एक नजर से देखेंगे और समाज में व्याप्त रूढीवादी सोच को अलविदा कहेंगे तो, समभाव के दृष्टीकोंण से जलाई अलख से बेटीयों के सम्मान का सूरज जरूर उदय होगा।  

स्वामी विवेकानंद जी कहते हैंः-  हम वो हैं जो हमारी सोच ने हमें बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखिये कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौंण हैं, विचार दूर तक यात्रा करते हैं। 

अतः सुसंस्कारों और सकारात्मक सोच से भ्रमित लोगों के मन में सामाजिक रिश्तो के प्रति आदर की भावना को जागृत करके महिलाओं और बेटीयों के साथ हो रहे दुराचार को रोका जा सकता। सुसंस्कृत शिक्षा से बेटी बचाओ, बेटी पढाओ योजनायें अवश्य सफल होंगी। 



मित्रों, यदि आपको लगता है कि इसके अलावा भी कुछ और पहलु  हैं जिसमें भी सुधार होना चाहिये तो अपने विचार अवश्य लिखें। सभ्य सामज का आगाज हम सब की नैतिक जिम्मेदारी है। 
धन्यवाद



Friday, November 7, 2014

जातिय, धार्मिक और भाषाई बंधनो से मुक्त भारत हो


पुरातन काल से भारत वर्ष सदा ही ज्ञान का आधार रहा है। भारत की धरती पर अनेक जाति, धर्म और सम्प्रदाय तथा भाषा के लोग इस प्रकार रहते हैं जैसे कि, एक वाटिका में अनेकों सुगंधित पुष्प। भारत की धरती हमेशा 'अतिथी देवो भवः' को आत्मसात करते हुए अनेक नामों से पहचानी जाती है। कोई इसे हिन्दोस्तान कहता है तो कोई इण्डिया जिसमें हिंदुज़म, जैनिज़म,  बौधिज़म, सिखीज़म, इस्लाम तथा ईसाइ धर्म समाया हुआ है। ऐसे अद्भुत भारत देश को 11 सितंबर 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद जी ने गौरवान्वित किया। भारत की श्रेष्ठ धार्मिक छवी से प्रभावित होकर 'न्यूयार्क हेरल ट्रिबूट्स' ने लिखा था कि, भारत जैसे देश में धार्मिक मिशनरियों को भेजना कितनी बङी मूर्खता थी।


आज उसी धरती पर धर्म, जाति और भाषा, विवाद का विषय बनता जा रहा हैं। कहने को तो हम विकासशील देश से आगे कदम बढाते हुए विकसित राष्ट्र की ओर अग्रसर हो रहे हैं। नई-नई तकनिकों का आविष्कार कर रहें हैं। फिर भी धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले महानुभावों के असंवेधानिक वचनो के जाल में उलझ जाते हैं। जबकि हम सब ही नही वरन् विज्ञान भी इस बात को मानता है कि, कोई शक्ति है जो पूरे ब्रह्माण्ड को  चला रही है। उस सर्वशक्ति को हम सभी ने अपने-अपने अुनसार एक रूप और नाम दे दिया है। ये रूप हमारी आस्था के प्रतीक हैं। किसी ने सच कहा है कि मानो तो ईश्वर न मानो तो पत्थर। हमारी आस्था के प्रतीक राम, रहीम, शिव, ईसामसीह हों या पैगंबर साहेब, गुरू नानक या साई बाबा हों या कृष्ण  ये सभी उस शक्ति का मूर्त रूप हैं जहाँ मनु्ष्य अपनी परेशानियों से निजात पाने के लिए अरदास ( प्रार्थना ) करता है। जिस दर पर सुकून और खुशियाँ मिल जाती हैं वही उस व्यक्ति के लिए पूजित हो जाता है।


कबीर दास जी कहते थे कि, 
"हिन्दु कहत है राम हमारा, मुसलमान रहमान।
आपस में दौऊ लङै मरतु हैं, मरम कोई नही जाना।।"

अर्थातः- हिन्दु कहते हैं कि हमारे राम सब कुछ हैं और मुसलमान कहते हैं कि रहीम ही सबकुछ हैं। इस तरह से ये आपस में लङते मरते रहते हैं। जबकि  सच तो यही है कि राम और रहीम एक ही हैं।


प्रकृति भी हमें धार्मिक, भाषाई और जातिय सिमाओं में नही बाँधती। सूरज सबको एक समान धूप देता है, हवा हिन्दु, मुस्लिम, सिख्ख या ईसाइ नही देखती। पेङ सभी के लिए फल देता है। परन्तु सबसे बुद्धिमान कहा जाने वाला प्राणी मनुष्य ही शान्ति के चमन को भेद-भाव की दुषित मानसिकता से नष्ट कर रहा है।  सोचिए ! यदि किसान जातिय और धार्मिक बंधनो में बंध जाये तो जिवन उपयोगी मूलभूत आवश्यक्ताओं की पूर्ती क्या संभव हो पायेगी ?

जब कोई व्यक्ति जिंदगी और मौत से जूझ रहा होता है तब उसे एवं उसके परिजन को डॉक्टर ही भगवान नजर आता है  तब वो ये नहीं देखते कि डॉक्टर किस जाति या धर्म को मानने वाला है। डॉक्टर भी इन बंधनो से मुक्त मरीज के इलाज को ही प्रथमिकता देते हैं। कल्पना किजीए यदि डॉक्टर भी भेद-भाव करने लगे तो क्या होगा ?  वहीं दूसरी तरफ परेशानी की इस घङी में परिजन अपने अस्वस्थ प्रियजन की सलामती के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। अपने मित्रों के परामर्श पर अन्य विपरीत धर्म के प्रतीकों से मन्नत माँगने में भी परहेज नहीं करते क्योंकि यहाँ प्रियजन की सलामती प्रमुख होती है और प्रियजन के ठीक हो जाने पर आस्था की एक नई ज्योति प्रज्वलित होती है, जो धार्मिक एवं जातिय बंधनो से मुक्त होती है। 


हमारे संविधान में भी प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने अनुसार धर्म, जाति एवं भाषा मानने को स्वतंत्र है। फिर क्यों कभी मौलवियों का फरमान तो कभी मठाधीशों के कट्टर अस्वभाविक बयानों से देश की शान्ति को भंग करने का प्रयास किया जाता हैं। जबकि हमारी पवित्र पुस्तकें कुरान, गीता, रामायण या बाइबल में इंसानियत की सीख दी गई है।  फिर भी इस अमुल्य सीख से बेखबर हमारे धर्माधिकारी विवादस्पद बयान दे देते हैं जिसका सबसे ज्यादा नुकसान उस निरिह जनता का होता है जिसके घर में दिन की आमदनी से रात का चुल्हा जलता है।  इस बात पर विचार करना चाहिए कि, क्या धार्मिक और जातिय प्रतिबंधो से विकास की इबारत लिख सकते हैं?   ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, स्वयं का या देश-दुनिया का विकास सभी के सहयोग से ही संभव है।


स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि,  "सभी धर्मों का गंतव्य स्थान एक है। जिस प्रकार विभिन्न मार्गो से बहती हुई नदियां समुंद्र में जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मत मतान्तर परमात्मा की ओर ले जाते हैं। मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।" 

मित्रों, हम सब मिलकर विकास के इस दौर में जातिय, भाषाई और धार्मिक बंधनो से मुक्त भारत का पुनरुथान करें। जहाँ की धरती पर युगों-युगों से सभी धर्मों तथा जातियों और अत्याचार पिङित मनुष्यों को आश्रय  मिलता रहा है, ऐसी पवित्र भुमि भारत देश में भारतीयता हमारी जाति हो और इंसानियत ही हमारा धर्म हो। 

जय भारत 

Thursday, October 16, 2014

एक महत्वपूर्ण सबक

एक महत्वपूर्ण सबक

एक अमीर आदमी तफरीह के लिए समुंद्र में नाव लेकर बहुत दूर निकल गया। अचानक जोर का तुफान आया। नाव थपेङों से क्षतिग्रस्त हो कर टूटने लगी, तो वो अमीर आदमी समूंद्र में कूद गया। तुफान थमा तो उसने खुद को एक निर्जन टापू पर पाया। वो सोचने लगा कि मैने जिंदगी में कभी भी किसी का भी बुरा नही किया फिर भी ईश्वर ने मुझे ऐसी विपदा में क्यों डाल दिया। अब पूरी जिंदगी यहीं विराने में गुजारनी होगी। ये सोचकर वह रहने के लिए एक झोपङी बनाने लगा। रात को वो उस झोपङी में सो गया। परंतु अचानक मौसम में ऐसा परिर्वतन हुआ कि बिजली कङकने लगी और तभी बिजली उसकी झोपङी पर गिरी जिससे झोपङी में आग लग गई। अपने रहने की जगह को आग में स्वाहा होते देखकर वह आदमी पूरी तरह टूट गया। इतनी परेशानी में वो ईश्वर को कोसने लगा।

तभी अचानक एक नाव टापू के किनारे आकर लगी। उसमें से दो व्यक्ति उतर कर टापू पर आए और कहने लगे कि हमने यहाँ जलती हुई आग देखी तो हमें लगा कि कोई परेशानी में है, वो आग जलाकर मुसिबत में मदद के लिए संकेत दे रहा है। इस लिए हम लोग यहाँ आए।

लोग कहते हैं कि ईश्वर नजर नही आता, पर सच तो ये है कि जब दुःख के समय कोई दोस्त, सम्बन्धी साथ नही देता तब ईश्वर ही नजर आता है।


 उस आदमी की आँखों से आँसू निकलने लगा और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते हुए कहने लगा कि किसी के मानने या न मानने से तुझे कोई फरक नही पङता। हे ईश्वर तू तो निर्विकार, अकिंचन, निस्पृह होकर अपना कर्तव्य करता रहता है।

मित्रों, जिन मुश्किलों में हम ईश्वर को भला-बूरा कहना शुरू कर देते हैं वास्तव में कई बार उसी  कठिन परिस्थिति में ही हमारा हित छुपा होता है। हम सिर्फ परेशानियों को ही देखते हैं जबकि ईश्वर हमारे हित के लिए  नये द्वार का सृजन करता है। अतः हमें हर परिस्थिति में ईश्वर को कोसने के बजाय एक नई आशा के साथ उसके प्रति आस्था और विश्वास की अलख हमेशा जलाए रखनी चाहिये।

Saturday, October 11, 2014

सफलता का आधार है, आत्मविश्वास



मित्रों, जीवन  में हम सभी अपने-अपने लक्ष्य को सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते रहते हैं। विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास होकर एक अच्छी नौकरी का सपना लिये आगे बढने की कोशिश करते हैं। व्यपारी अपने कारोबार को आगे बढाने का सपना देखते हैं, खिलाङी सर्वश्रेष्ठ प्रर्दशन का सपना संजोते हैं। ऐसे ही अनेक लोग अपने-अपने  क्षेत्रों में अपना बेस्ट देने का प्रयास करते हैं और सफलता अर्जित करना चाहते हैं। किन्तु अक्सर देखा जाता है कि सभी को सफलता आसानी से मिल जाये ये मुमकिन नही होता। परेशानियां और अङचने तो आ ही जाती हैं, जिसके कारण उत्साह में थोङी उदासीनता आना स्वाभाविक है परंतु ऐसी विषम परिस्थिति में हमारा आत्मविश्वास ही एक जादूई पारस पत्थर की तरह हमें आगे बढने में मदद करता है। आत्मविश्वास अर्थात स्वयं पर विश्वास। हम लोग अक्सर एक शब्द सुनते हैं इच्छा-शक्ति इस इच्छा और शक्ति के बीच छुपा हुआ जो प्रकाश पुंज है वही है आत्मविश्वास। किसी कार्य को करने की कामना अर्थात इच्छा रखना बहुत अच्छी बात है परंतु आत्मविश्वास की ज्योति के बिना किसी काम में सफलता की कामना करना अपने आप को धोखा देने के समान है। 

स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं कि, "जिसमें आत्मविश्वास नही उसमें अन्य चीजों के प्रति कैसे विश्वास हो सकता है ? "

आत्मविश्वास तो सफलता की नॉव का एक ऐसा सशक्त मल्लाह है, जो डूबती नॉव को उलझनों एवं कठिनाईंयों की प्रचंड लहरों के बीच, पतवार के सहारे नही बल्कि अपने विश्वास रूपी हाँथों के सहारे बाहर ले आता है। गाँधी जी एवं अनेक देशभक्तों के आत्मविश्वास का ही परिणाम है भारत की आजादी। स्वामी विवेकानंद जी अपने आत्मविश्वास के बल पर ही शिकागो धर्म सभा में भारत को गौरवान्वित कर सके, जबकि विदेष में उन्हे अपनी वेश-भूषा के कारण उपहास का पात्र बनना पङा था। बुद्ध, ईसा, सुकरात जैसे लोगों ने तो अपने आत्मविश्वास के बल पर युगों के प्रवाह को ही मोङ दिया। मानव जीवन के इतिहास में महापुरुषों के आत्मविश्वास का असीम योगदान है। महाराणा प्रताप अपने बच्चों के साथ भूखे-प्यासे जंगल-जंगल भटक रहे थे। अकबर की विशाल सेना उनके पीछे पङी हुई थी। उन्हे अकबर द्वारा कई प्रलोभन दिया गया। उनके पास समर्पण का भी प्रस्ताव भेजा गया जिसके बदले में उनका राज्य उन्हे लौटाने की बात कही गई, परंतु आत्मविश्वासी महाराणा प्रताप किसी भी प्रलोभन के चंगुल में नही फंसे और अंत तक युद्ध करते रहे। उनकी विरता की गाथा और स्वाभिमान राजस्थान का गौरव है। 

स्वामी रामतीर्थ कहते हैंः-  "धरती को हिलाने के लिए धरती से बाहर खङे होने की जरूरत नही है। आवश्यकता है, आत्मा की शक्ति को जानने और जगाने की।" 

सुदृढ विश्वास किसी भी चुनौति से घबराता नही है, बल्कि उससे पार पाने के लिए अपनी राह निकालकर आगे की ओर अग्रसर हो जाता है। खिलाङी हो या सैनिक दोनों ही अपने आत्मविश्वास से ही जीत हासिल करते हैं। पूरे एक वर्ष की पढाई को व्यक्त करने के लिए तीन घंटे की परिक्षा का समय कितना कम होता है!  और तो और कभी-कभी तो कुछ ऐसे प्रश्न भी आ जाते हैं जो उनके कोर्स का नही होता है। ऐसी स्थिती में जो विद्यार्थी अपना पूरा ज्ञान,  संयम और आत्मविश्वास के साथ ध्यान करता है वो लगभग सभी प्रश्नों के उत्तर सफलता से देकर अच्छे अंकों को प्राप्त करता है। वहीं जो विद्यार्थी ऐसे  अप्रत्याशी प्रश्नों को देखकर घबरा जाते हैं, वो याद किया हुआ उत्तर भी सही ढंग से नही लिख पाते उनका आत्मविश्वास डगमगा जाता है, जिससे उन्हे उनकी आशा के अनुरूप अंक नही मिलपाते। आत्मविश्वास तो ऐसी मनः स्थिति है, जो प्रकृति, संस्कृति, परिस्थिति एवं नियति (भाग्य) किसी के भी विरुद्ध खङी हो सकती है, भले ही मार्ग नया हो।  पर जिसके भी साथ होती है, उसकी अपनी नई ऊर्जा के साथ होती है। 

रामधारी सिंह दिनकर कहते हैंः-  "सियाही देखता है, देखता है तु अंधेरे को,
                                                 किरण को घेरकर छाए हुए विकराल घेरे को,
                                                 उसे भी देख, जो इस बाहरी तम को बहा सकती है।
                                                 दबी तेरे लहु में रौशनी की धार है साथी,
                                                 उसे भी देख, जो भीतर भरा अंगार है साथी।" 

आत्मविश्वास, किसी टिमटिमाते दिपक की लौ के समान नही होता, जो फूंक मारने से भी कंपित हो जाये; बल्कि वो तो ऐसा दावानल है, जो आँधी और तुफान से बुझने के बजाय और भी प्रज्वलित हो जाता है। आत्मविशवास हमारी सफलता का अभिन्न अंग है, परंतु अति आत्मविशवास एक बिमार मानसिकता का प्रतीक है, जिससे हम सबको बचना चाहिए। 

आत्मविश्वास रूपी प्रेरणा कुछ आन्तरिक संक्लपों से निर्मित होती है तो कुछ बाह्य कारणों से निर्मत होती है, जिसे अंग्रेजी में नेचर बनाम नर्चर का नाम दिया जाता है। एक बच्चा या बच्ची जब साइकिल चलाना सिखते हैं तो उनके अभिभावक पिछे से साइकिल को पकङे रहते हैं, बच्चे को भी विश्वास होता है अपने अभिभावक पर और वो आगे देखकर साइकिल चलाने लगता है। कुछ पल बाद जब अभिभावक को लगता है कि बच्चा अपना बैलेंस बना ले रहा है तो, वह अपने को साइकिल से दूर कर लेते हैं और बच्चा अकेले ही साइकिल चलाने लगता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उसके अभिभावक उसे पकङे हुए हैं। जब उसे सत्य स्थिति का बोध होता है तो एकबार थोङा लङखङाता है किन्तु दूसरे ही पल आत्मविश्वास के साथ पुनः साइकिल चलाने लगता है। विश्वास हमारे व्यक्तित्व की ऐसी विभूति है, जो आश्चर्यजनक ढंग से हमसे बङे सा बङा कार्य करवा लेती है। आज की अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनिक, मंगल की यात्रा हो या पुराने समय के मिस्र के पिरामिड, पनामा नहर और दुर्गम पर्वतों पर बने भवन और सङक मार्ग इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं। 

स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं, "कभी कमजोर नही पङें, आप अपने आपको शक्तिशाली बनाओ, आपके भीतर अनंत शक्ति है।" 

जीवन में जब कठिनाईयां आती हैं तो कष्ट होता है, लेकिन जब यही कठिनाईयां जाती हैं तो प्रसन्नता के साथ-साथ एक आत्मविश्वास को भी जगा जाती हैं। जो कष्ट की तुलना में अधिक मूल्वान है।  नाकामयाबी को सिर्फ सङक का एक स्पीड ब्रेकर समझें जिसके बाद हम पुनः अपनी आत्मशक्ति रूपी ऊर्जा से आगे बढें। आत्मविश्वास की कूंजी से हम सब अपने-अपने लक्ष्यों का ताला सफलता से खोल सकेगें क्योंकि सफलता की नींव है, मेहनत और विश्वास।  अतः मित्रों, आत्मविश्वास रूपी बीज का अंकुरण अवश्य करें उसे अपनी सकारत्मक सोच और मेहनत की खाद से पोषित करें क्योंकि आत्मविश्वास सम्पूर्ण सफलताओं का आधार है। 

"Self Confidence the foundation of all great success & achievement."

Tuesday, October 7, 2014

महात्मा का सपना, मोदी का मिशन - आइए, हम सभी भंगी बने


एक थाने के बाहर झाड़ू लगाता देश के प्रधानमंत्री, रेलवे स्टेशन की सफाई करता रेलमंत्री, सफाई के लिए अपने पैतृक गांव को गोद लेती जलसंसाधन मंत्री; नाला साफ करता विपक्षी पार्टी का एक प्रमुख, सड़कों पर झाड़ू उठाए खड़े मुंबइया सितारे और “न गंदगी करुंगा और न करने दूंगा” कहकर शपथ लेते 31 लाख केन्द्रीय कर्मचारी। दिखावटी हों, तो भी कितने दुर्लभ दृश्य थे ये! ‘नायक’ एक फिल्म ही तो थी, किंतु एक दिन के मुख्यमंत्री ने खलनायक को छोड़कर, किस देशभक्त के दिल पर छाप न छोड़ी होगी?

सफाई की छूत-अछूत


दुर्भाग्यपूर्ण है कि ‘स्वच्छ भारत’ का आगाज करने के उपक्रम में हमने भाजपा नेता, अभिनेता, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सरकारी कर्मचारियों व आम आदमी के अलावा सिर्फ आम आदमी पार्टी के नेता व कार्यकर्ताओं को ही शामिल देखा। दूसरी पार्टियों के लोगों को अपने से यह सवाल अवश्य पूछना चाहिए कि यह राजनीति हो, तो भी क्या यह नई तरह की राजनीति नहीं है? महात्मा गांधी ने भी तो शक्ति और सत्ता की जगह स्वराज और सत्याग्रह जैसे नए शब्द देकर नए तरह की राजनीति पैदा करने की कोशिश की थी।

क्या इस राजनीति से गुरेज किए जाने की जरूरत है? राजीव शुक्ला ने इस अभियान को अच्छी पहल कहा। किंतु क्या गांधी को अपना बताने वाली कांग्रेस पार्टी को गांधी के सपने के लिए हाथ में झाड़ू थामने से गुरेज करने की जरूरत थी? मोदी की छूत से महात्मा के सपने को अछूत माना लेना, क्या स्वयं महात्मा गांधी को अच्छा लगता? आइये, अपने दिमाग के जालों को साफ करें; जवाब मिल जाएगा।

मोहन का सपना, मोदी का मिशन


12 वर्षीय मोहनदास सोचता था कि उनका पाखाना साफ करने ऊका क्यों आता है? वह और घर वाले खुद अपना पाखाना साफ क्यों नहीं करते? किंतु क्या आज 133 बरस बाद भी हम यह सोच पाए? जातीय भेदभाव और छुआछूत के उस युग में भी मोहनदास, ऊका के साथ खेलकर खुश होता था। हमारी अन्य जातियां, आज भी वाल्मीकि समाज के बच्चों के साथ अपने बच्चों को खेलता देखकर खुश नहीं होती।

विदेश से लौटने के बाद बैरिस्टर गांधी ने भारत में अपना पहला सार्वजनिक भाषण बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में दिया था। मौका था, दीक्षांत समारोह का; बोलना था शिक्षा पर, गांधी को बाबा विश्वनाथ मंदिर और गलियों की गंदगी ने इतना व्यथित किया कि वह बोले गंदगी पर। उन्होंने कहा कि यदि अभी कोई अजनबी आ जाए, तो वह हिंदुओं के बारे में क्या सोचेगा?

यह बात 100 बरस पुरानी है। आज 100 बरस बाद भी हिंदू समाज अपनी तीर्थनगरियों के बारे में वैसा नहीं सोच पाए। कितने ही गांधीवादी व दलित नेता, गर्वनर से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक हुए, स्वच्छता को प्रतिष्ठित करने का ऐसा व्यापक हौसला क्या किसी ने दिखाया? मायावती ने सफाई कर्मी की नौकरी को बाकि दूसरी जातियों के लिए खोलकर छुआछूत की खाई को पाटने का एक प्रयोग किया था। वह आगे न बढ़ सका। ऐसे में यदि आज उसी बाबा विश्वनाथ की नगरी से चुने एक जनप्रतिनिधि ने बतौर प्रधानमंत्री वैसा सोचने का हौसला दिखाया है, तो क्या बुरा किया?

बापू को राष्ट्रपिता मानने वाले भारतीय जन-जन को यदि मोदी यह बता सकें कि राष्ट्रपिता की जन्मतिथि, सिर्फ छुट्टी मनाने, भाषण सुनने या सुनाने के लिए नहीं होती; यह अपने निजी-सार्वजनिक जीवन में शुचिता का आत्मप्रयोग करने के लिए भी होती है; तो क्या यह आह्वान नकार देने लायक है? भारत की सड़कों, शौचालयों व अन्य सार्वजनिक स्थानों में कायम गंदगी और गंदी बातें, राष्ट्रीय शर्म का विषय हैं। इस बाबत् की किसी भी सकारात्मक पहल का स्वागत होना चाहिए।

प्रतीकों से आगे जाएगी पहल


यह पहल संकेतों व प्रतीकों तक सीमित नहीं रहेगी; कई घोषणाओं ने इसका भी इजहार कर दिया है। सफाई के लिए 62,000 करोड़ रुपए का बजट; बजट जुटाने के लिए स्वच्छ भारत कोष की स्थापना, कारपोरेट जगत से सामाजिक जिम्मेदारी के तहत् धन देने की अपील और गंदगी फैलाने वालों के लिए जुर्माना। 2019 तक 11 करोड़, 11 लाख शौचालय का लक्ष्य और 2,47,000 ग्राम पंचायतों में प्रत्येक को सालाना 20 लाख रुपए की राशि।

शहरी विकास मंत्रालय ने एक लाख शौचालयों की घोषणा की है। मंत्रालय ने निजी शौचालय निर्माण में चार हजार, सामुदायिक में 40 प्रतिशत और ठोस कचरा प्रबंधन में 20 प्रतिशत अंशदान का ऐलान किया है। कोयला एवं बिजली मंत्रालय ने एक लाख शौचालय निर्माण की जिम्मेदारी ली है। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों में ओएनजीसी ने 2500 सरकारी स्कूल, गेल ने 1021, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने 900 शौचालय निर्माण का वायदा किया है।

शौचालय, स्वच्छता और सावधानी


हालांकि, यदि यह कार्यक्रम सिर्फ शौचालयों तक सीमित रहा, तो ‘स्वच्छ भारत’ की सफलता भी सीमित ही रह जाएगी। संप्रग सरकार की ‘निर्मल ग्राम योजना’ भी शौचालयों तक सिमटकर रह गई थी। ऐसा न हो। शौचालय, निस्संदेह हमारी सांस्थानिक, सार्वजनिक, शहरी और शहरीकृत ग्रामीण आबादी की एक जरूरी जरूरत हैं।

इस जरूरत की पूर्ति भी निस्संदेह, एक बड़ी चुनौती है। पैसा जुटाकर हम इस चुनौती से तो निबट सकते हैं। किंतु सिर्फ पैसे और मशीनों के बूते सभी शौचालयों से निकलने वाले मल को निपटा नहीं सकते। इसी बिना पर ग्रामीण इलाकों में घर-घर शौचालयों के सपने पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। गांधी जी ने गांवों में गंदगी का निपटारा करने के लिए कभी शौचालयों की मांग की हो; मेरे संज्ञान में नहीं है। वह खुले शौच को मिट्टी डालकर ढक देने के पक्ष में थे।

भारत में हर रोज 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरा हर रोज पैदा होता है। यदि हम इसका ठीक से निष्पादन करें, तो इतने कचरे से 27 हजार करोड़ रुपये की खाद पैदा की जा सकती है 45 लाख एकड़ बंजर को उपजाऊ खेतों में बदला जा सकता है। 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज पैदा करने की क्षमता हासिल की जा सकती है और दो लाख सिलेंडरों हेतु अतिरिक्त गैस हासिल की जा सकती है। उचित नियोजन और सभी के संकल्प से यह किया जा सकता है। सरकार ने स्वच्छता को मिशन बनाया है, हम इसे आदत बनाएं। ‘स्वच्छ भारत’ का यह मिशन यदि यह संभव कर सका, तो सफाई की सौगात दूर तक जाएगी। वाल्मीकि बस्ती के परिसर में प्रधानमंत्री जी ने जिस शौचालय का फीता काटकर लोकार्पण किया था, वह भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन द्वारा ईजाद खास जैविक तकनीक पर आधारित है। ऐसी कई तकनीकें साधक हो सकती हैं। यदि हमने भिन्न भू-सांस्कृतिक विविधता की अनुकूल तकनीकों को नहीं अपनाया अथवा हर शौचालय को सीवेज पाइपलाइन आधारित बनाने की गलती की, तो सवाल फिर उठेंगे। न निपट पाने वाला मल, हमारे भूजल और नदियों को और मलीन करेगा; साथ ही हमें भी।

ठोस कचरे की चुनौती


इस चुनौती में हमें औद्योगिक कचरे के अलावा अन्य ठोस कचरा निपटान को भी शामिल कर लेना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक्स कचरा निपटान में बदहाली को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने अभी हाल ही में मंत्रालय को नोटिस भेजा है। यदि हम चाहते हैं कि कचरा न्यूनतम उत्पन्न हो, तो हम ‘यूज एण्ड थ्रो’ प्रवृति को हतोत्साहित करने वाले टिकाऊ उत्पाद नियोजित करें। कचरे का निष्पादन उसके स्रोत पर ही करने की पहल जरूरी है। कचरे का सर्वश्रेष्ठ निष्पादन विशेषज्ञता, सुनियोजन, कड़े कानून, क्रियान्वयन में बेहद सख्त अनुशासन तथा प्रेरणा की भी मांग करता है। यह किए बगैर ‘स्वच्छ भारत’ की कल्पना मुश्किल है।

रोजी छूटे न


पश्चिम के देशों से शहरों की सफाई का शास्त्र सीखने की बात गांधी जी ने भी की थी। किंतु यदि स्वच्छ भारत का यह मिशन, अमेरिका के साथ मिलकर भारत के 500 शहरों में संयुक्त रूप से ‘वाश’ कार्यक्रम के वादे में सिर्फ निजी कपंनियों के फायदे की पूर्ति के लिए शुरू किया गया साबित हुआ, तो तारीफ करने से पहले बकौल गांधी, जांच साध्य के साधन की शुचिता की करनी जरूरी होगी। सफाई कर्मचारियों की रोजी पहले ही ठेके के ठेले पर लुढ़क रही हैै। विदेशी कंपनियां और मशीनें आईं तो उनकी रोजी को ठेंगा देखने की नौबत न आए; यह सुनिश्चित करना होगा।

आज भारत, दुनिया से बेहद खतरनाक किस्म का बेशुमार कचरा खरीदने वाला देश है। भारत, दुनिया के कचरा फेंकने वाले उद्योगों को अपने यहां न्योता देकर बुलाकर खुश होने वाला देश है। भारत अब एक ऐसा देश भी हो गया है, जो पहले अपनी हवा, पानी और भूमि को मलीन करने में यकीन रखता है और फिर मलीनता को साफ करने के लिए कर्जदार होने में। आइये, हम इस ककहरा को उलट दें। हम यह सुनिश्चित करें किं ‘स्वच्छ भारत’ का यह मिशन भारत के 20 करोड़ बेरोजगारों को रोजगार व स्वरोजगार देने वाला साबित हो।

सफाई बने सौगात


एक आकलन के मुताबिक, भारत में हर रोज 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरा हर रोज पैदा होता है। यदि हम इसका ठीक से निष्पादन करें, तो इतने कचरे से 27 हजार करोड़ रुपये की खाद पैदा की जा सकती है 45 लाख एकड़ बंजर को उपजाऊ खेतों में बदला जा सकता है। 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज पैदा करने की क्षमता हासिल की जा सकती है और दो लाख सिलेंडरों हेतु अतिरिक्त गैस हासिल की जा सकती है।

उचित नियोजन और सभी के संकल्प से यह किया जा सकता है। सरकार ने स्वच्छता को मिशन बनाया है, हम इसे आदत बनाएं। ‘स्वच्छ भारत’ का यह मिशन यदि यह संभव कर सका, तो सफाई की सौगात दूर तक जाएगी। भारत की कृषि, आर्थिकी, रोजगार और सामाजिक दर्शन में कई स्वावलंबी परिवर्तन देखने को मिलेंगे।

स्वच्छ भारत अभियान

व्यापक मलीनता को व्यापक शुचिता की दरकार


हालांकि यदि हम सफाई, स्वच्छता, शुचिता जैसे आग्रहों को सामने रख गांधी द्वारा किए आत्मप्रयोग और संपूर्ण सपने को सामने रखेंगे, तो हमें बात मलीन राजनीति, मलीन अर्थव्यवस्था, मलीन तंत्र, मलीन नदियां, हवा, भूमि, भ्रष्टाचार, बीमार अस्पताल, बलात्कार, पोर्न और नशे से लेकर हमारी मलीन मानसिकता के कई पहलुओं की करनी होगी; किंतु गांधी ने सफाई करने वालों के बारे में हमारे समाज की जिस मलीनता को दूर करने का संदेशा दिया था, उसका उल्लेख किए बगैर यह लेख अधूरा ही रहेगा।

आइए, हम सभी भंगी बने


गांधी ने सफाई करने के काम को अलग पेशा मानने वाले समाज को दोषपूर्ण करार दिया था। वह मानते थे कि यह भावना हम सब के मन में बचपन से ही जम जानी चाहिए कि हम सब भंगी हैं। इसका सबसे आसान तरीका यह बताया था कि हम अपने शारीरिक श्रम का आरंभ पाखाना साफ करके करें।

शहरों की स्वच्छता को निगम पार्षदों द्वारा सेवा भाव से लेने की हिदायत देते हुए गांधी जी ने उनसे अपेक्षा की थी कि वे अपने को भंगी कहने में गौरव का अनुभव करेंगे। गौर कीजिए, उनका लक्ष्य सिर्फ सफाई अथवा सफाई वाला वर्ग नहीं था। वह चाहते थे कि इसके जरिए हम धर्म को एक निराले ढंग से समझें व स्वीकारने योग्य बन जाएं। दुआ कीजिए कि ‘स्वच्छ भारत’ हमें मानसिक रूप से इतना स्वच्छ बना सके कि हम निजी और सार्वजनिक ही नहीं, बल्कि धर्म और जाति की मलीन खाइयों को पाट सकें। इससे महात्मा जी का सपना भी पूरा हो जाएगा और मोदी का मिशन भी।

Wednesday, September 10, 2014

विवाह जैसे पवित्र बंधन पर तलाक का ग्रहणं क्यों???

हिन्दु धर्म में प्रचलित सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है विवाह, जिसके गठबंधन से दो लोगों यानि की वर एवं वधु ही नही बल्की दो परिवारों, दो संस्कारों का भी मिलन होता है। मानव समाज की महत्वपूर्ण प्रथा विवाह के अंर्तगत वर एवं वधु अग्नि को साक्षी मान कर तन, मन और आत्मा के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हमारे पुराणों, वेदो एवं साहित्यों में भी विवाह की मर्यादा को स्थापित किया गया है।समाज में  हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाने वाला वैवाहिक बंधन का कार्यक्रम दो दशक पहले तक 10 - 12 दिन तक चलता था। समय के साथ 5 दिन का हो गया फिर तीन दिन में ही विवाह कार्यक्रम संपन्न होने लगे। आज आलम ये है कि समाज का अति महत्वपूर्ण संस्कार महज तीन घंटे में संपन्न हो जाता है। समय की कमी का रोना रोने वालों के लिए वो दिन दूर नही जब विवाह जैसा पवित्र बंधन "रेडी टू ईट" की तरह दो मिनट में ही पूर्ण हो जायेगा। 

कहते हैं "सोना तप कर ही कुन्दन बनता है" उसी प्रकार वैवाहिक बंधन भी अपनी-अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार हवन की वेदी पर अग्नि के समक्ष किये गये वादों से मजबूत होता है। समय के परिवर्तन ने और आधुनिकता की आँधी से इस पवित्र संस्कार में बदलाव की बयार बह रही है। जहाँ गोत्र, जाति, धर्म एवं गुण आदि का कठोरता से पालन होता था वहाँ अब लङके लङकियों की राय और पसंद को महत्व दिया जा रहा है। पूराने जमाने की मान्यताओं, उपजाति, योग्य वर, सुशील दुल्हन जैसी कसौटियों से हट कर पालक की सहमति से अंर्तजातिय विवाह को सहमति मिल रही है। जाति तो अब केवल राजनैतिक उपकरण रह गई है।  

शादी को लेकर अब लचीला और व्यवहारिक रवैया अपनाया जा रहा है। वैचारिक सामजस्य पर अधिक जोर दिया जा रहा है। वर-वधु की तलाश पंडितों या रिश्तेदारों की बजाय वैवाहिक विज्ञापनो तथा इंटरनेट के माध्यम से की जा रही है। मन में प्रश्न ये उठना स्वाभाविक है कि आज अधिक लचिलापन, वैचारिक महत्व और उच्च शिक्षा के बावजूद वैवाहिक बंधन तलाक जैसी कुप्रथा की अग्नि में पहले से ज्यादा क्यों सुलग रहे हैं?

विज्ञान की नित नई टेक्नोल़ॉजी जहाँ विकास के नये आयाम खोल रही है वहीं, वैचारिक सामजस्य के बावजूद विवाह जैसे पवित्र बंधन को विच्छेद भी कर रही है। एक सर्वे के अनुसार विगत एक साल में तलाक का कारण आधुनिक परिवेश में व्याप्त फेसबुक और वाट्सअप जैसी सुवधाएं भी हैं। कई बार नेटवर्क प्रॉब्लम की वजह से कुछ ऐसी गलतफहमी हो जाती है कि बात तलाक तक पहुँच जाती है। वास्तव में हम सभी आज आधुनिकता के रंग में इस कदर रंग गये हैं कि एक दूसरे की बातों को धैर्य से सुनने की शक्ति को कहीं खोते जा रहे हैं। एक तरफ तो हमारी नई टेक्नोल़ॉजी और दूसरी तरफ सामाजिक दुषित मान्यता रिश्तों को तोङने में "आग में घी" का काम करती हैं। 

आज हम कितने भी आधुनिक होने का परचम फैलाएं किन्तु अभी भी सिर्फ लङकियों को ही अच्छी पत्नी एवं अच्छी बहु बनने की नसीहत दी जाती है। कोई भी अभिभावक अपने बेटे को एक अच्छा पति एवं अच्छा दामाद बनने की नसिहत क्यों नही देते?  21वीं शदी में लङका और लङकी की बराबरी की बात करते हैं। हिन्दु अधिनियम 955 के तहत दोनों को बराबरी का दर्जा देते हैं। वेदों के अनुसार भी पत्नि को आधा अंश कहते हैं। "ताली तो दोनो हाँथ से ही बजती है" फिर सिर्फ एक को नसिहत देने से विवाह जैसे पवित्र बंधन को कब तक टूटने से बचाया जा सकता है। 


कुछ लङके प्यार  को समझते हुए भावनात्मक भावनाओं से युक्त यदि अपनी पत्नी की काबलियत का आदर करते हैं और उनकी कही बात को  अहमियत देते हैं तो, हमारे अपने कहे जाने वाले रिश्ते ही इस भावना को "जोरू का गुलाम" जैसी उपाधी दे देते हैं। कई बार ऐसे आघातों से दामपत्य जैसा मधुर रिश्ता धाराशायी हो जाता है। 

विवाह संबन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए काउनसलर (सलाहाकारों) की बढती बयार यही दर्शाती है कि हमारे समाज में आज हम भले ही अधिक शिक्षित हो गये हों, अधिक आर्थिक संपन्न हो गये हों परन्तु भावनात्मक रिश्तों को आपस में सुलझाने में असर्मथ हैं। ये सलाहकार मनोवैज्ञानिक दृष्टीकोंण से समझा जरूर सकते हैं किन्तु रिश्ते सदैव मधुर रहें इसकी गारंटी नही देते। अतः वैवाहिक युगल को अपनी समस्याओं को आपसी बातचीत और धैर्य के साथ स्वविवेक से हल करना चाहिए, जिससे आधुनिकता के परिवेश में भी  हम अपनी संस्कृति जो की भावनात्मक रिश्तों की नींव है, उससे दूर न हों सकें। 

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, विवाह जैसे पवित्र संस्कार को जिस पर सृष्टी  को आगे बढाने का दायित्व भी है ऐसे पवित्र बंधन को अपने प्यार, समर्पण और आपसी समझदारी से इतना मजबूत करना चाहिये कि आधुनिकता और सामाजिक दुषित सोच  इस बंधन को तोङ न सकें। 

Marrige is a thousand little things.... 
It's giving up your right to be right in the heat of an argument. It's forgiving another when the let you down . It's loving someone enough to step down so they can shine. It's frindship. It's being a cheerleader and trusted confidant. It's place of forgiveness that welcomes one home and arms they can run to in the mist of a storm. 
It's grace.

Tuesday, September 9, 2014

उत्तराखण्ड के पाँच प्रयाग

उत्तराखण्ड के पाँच प्रयाग



भारत वर्ष में पवित्र नदियों के संगम को प्रयाग कहा जाता है। इलाहाबाद में गंगा, जमुना एवं सरस्वती के संगम को प्रयाग राज कहा जाता है। ऐसे ही उत्तराखण्ड के पाँच प्रयागों का हमारे धर्मों में विषेश महत्व है। जो इस प्रकार हैः-


देवप्रयागः- अलकनंदा तथा भगीरथ नदियों के संगम पर देवप्रयाग नामक स्थान स्थित है। इसी संगम स्थल के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है । यह समुद्र सतह से १५०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। देवप्रयाग में शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर हैजो की यहां के मुख्य आकर्षण हैं। रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली से निर्मित है। देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है। देवप्रयाग में कौवे दिखायी नहीं देतेजो की एक आश्चर्य की बात है।



रुद्र प्रयागः- रुद्र प्रयाग मंदाकिनी और अलकनंदा के संगम पर स्थित है। अलकनंदा का उद्गम स्थल बद्रीनाथ धाम है एवं मंदाकिनी शिव के क्षेत्र केदारनाथ से प्रवाहित होती है। रुद्र प्रयाग में ही नारद जी ने रुद्र रूप शिव से संगीत का ज्ञान प्राप्त किया था। यहाँ शिव के रुद्र अवतार का दर्शन होता है। यहीं पर भगवान रुद्र ने श्री नारदजी को `महतीनाम की वीणा भी प्रदान की थी। यहीं से केदारनाथ के दर्शन हेतु यात्रा मार्ग आरंभ होता है।

कर्ण प्रयागः-  कर्ण प्रयाग में अलकनंदा तथा पिंडर नदी का संगम स्थल है। पिण्डर का एक नाम कर्ण गंगा भी हैजिसके कारण ही इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग पडा। यहीं पर महादानी कर्ण द्वारा भगवान सूर्य की आराधना और अभेद्य कवच कुंडलों का प्राप्त किया जाना प्रसिद्ध है। कर्ण की तपस्थली होने के कारण भी इस स्थान को कर्णप्रयाग कहा जाता है।

नंद प्रयागः- नंदाकिनी एवं अलकनंदा के संगम को नंद प्रयाग कहते हैं। कर्णप्रयाग से उत्तर में बदरीनाथ मार्ग पर 21 किमी आगे नंदाकिनी एवं अलकनंदा का पावन संगम है। पौराणिक कथा के अनुसार यहां पर नंद महाराज ने भगवान नारायण की प्रसन्नता और उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया था। यहां पर नंदादेवी का भी बड़ा सुंदर मन्दिर है। नन्दा का मंदिरनंद की तपस्थली एवं नंदाकिनी का संगम आदि योगों से इस स्थान का नाम नंदप्रयाग पड़ा। संगम पर भगवान शंकर का दिव्य मंदिर है। यहां पर लक्ष्मीनारायण और गोपालजी के मंदिर दर्शनीय हैं। यह सागर तल से २८०५ फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है।है।

विष्णु पुराणः- विष्णु पुराण धौली गंगा तथा अलकनंदा का संगम स्थल है। यहाँ विष्णु जी की प्रतिमा से सुशोभित मंदिर और विष्णुकुण्ड दर्शनिय है। यहीं से सूक्ष्म बदरिकाश्रम प्रारंभ होता है। इसी स्थल पर दायें-बायें दो पर्वत हैंजिन्हें भगवान के द्वारपालों के रूप में जाना जाता है। दायें जय और बायें विजय हैं। स्कंद पुराण में इसका वर्णन वर्णित है।


भारत की संस्कृति में नदियों को देवी रूप प्रदान किया गया है, अतः उपरोक्त प्रयागों का दर्शन धार्मिक यात्रा में विशेष महत्व रखता है। इन पाँच प्रयागों के पश्चात ही देव प्रयाग के बाद से ही इस धरती पर माँ गंगा का अवतरण होता है। ऋषिकेश से अलकनंदा मंदाकिनी नंदाकिनी धौली गंगा पिंडर नदी तथा भागीरथी माँ गंगा के नाम से इस धरती पर पूज्यनिय हैं। पवित्र पावनी जीवनदायनी मोक्षदायनि माँ गंगा को निमर्ल एवं स्वच्छ रखने का प्रण करते हुए शत् शत् नमन करते हैं।

आधुनिक परिपेक्ष में पित्रों की स्मृति


अपने पूर्वजों के प्रति स्नेह, विनम्रता, आदर व श्रद्धा भाव से किया जाने वाला कर्म ही श्राद्ध है। यह पितृ ऋण से मुक्ति पाने का सरल उपाय भी है। इसे पितृयज्ञ भी कहा गया है। हर साल भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक श्राद्ध पर्व का आयेजन चलता है।

ब्रह्मपुराण के अनुसार श्राद्ध पक्ष में ब्राह्म्ण भोजन के अलावा दान का भी बड़ा भारी महत्व है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पित्रों के निमित्त किये गये दान का उत्तम फल प्राप्त होता है।  

पित्रों के सम्मान में आज के परिपेक्ष में थोङा परिवर्तन नजर आता है, जैसे- आज कल श्राध्द पक्ष के दौरान अनाथ आश्रमों में भोजन कराने का चलन तेजी से बढा है। ये बहुत अच्छी बात है, कम से कम सम्पन्न ब्राह्म्णों को तो भोजन कराने से लाख गुना अच्छा है। किन्तु कभी हम सबने ये सोचा कि पुण्य के इस शुभ कार्य में जाने-अनजाने हम बच्चो में कैसी मानसिकता का विकास कर रहे हैं? किसी की पुण्य तीथि उनके लिये किसी उत्सव से कम नही होती क्योंकि उनको अच्छे-अच्छे पकवान खाने को मिलते हैं। पूरे 15 दिन किसी उत्सव से कम नजर नही आते।

दिवस तो सिर्फ 15 होते हैं, पुण्य तिथियाँ अनगिनत, आलम ये होता है कि सुबह के नाश्ते से लेकर रात्री भोजन तक पकवानों की बाँढ सी आ जाती है। ये सिलसिला श्राद्ध पक्ष की शुरुवात से अंत तक ऐसे ही चलता है। विचार करने योग्य बात ये है कि लगातार 15 दिनों तक गरिष्ठ भोजन क्या स्वास्थ की दृष्टी से अनुकूल है, क्या हम अपने बच्चों को भी ऐसे ही लगातार गरिष्ठ भोजन देते हैं?

हम कई आश्रमों के बच्चों से मिले हैं। जो बच्चे छोटे हैं, नासमझ हैं, वो तो ऐसी परंपरा से बहुत खुश होते हैं क्योंकि उन्हे रोज पकवान खाने को मिलता है। उनको इससे कोई मतलब नही कि उनके स्वास्थ पर क्या असर होगा, किन्तु जो समझदार हैं, बङे हैं, वो ऐसा खाना रोज खाने से भूखे रहना ज्यादा पसंद करते हैं। हम सब अपने पूर्वजों को खुश करने के लिये ये कार्य करते हैं। ये सब देखकर क्या हमारे पूर्वज खुश होते होंगे ?

वर्ष में 365 दिन होते हैं किन्तु हम मे से कई लोगों को पित्रपक्ष के किसी एक दिन ही ये बच्चे याद आते हैं, बाकी दिन उनको भोजन मिला या नही ये तो हम देखने ही नही जाते, क्योंकि हमारी प्राथमिकता तो पित्रपक्ष में अपने पित्रों को खुश करना है वो भी इसलिये, कि मान्यता अनुसार श्राद्ध करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्त हो सुख प्राप्त करता है एवं अंत में परम गति को प्राप्त होता है।

मित्रों यदि हम वास्तव में अपने पित्रों को याद करते हैं एवं उनका आर्शिवाद हमेशा चाहते हैं, तो हमें अपनी सोच एवं रूढीवादी विचारों को थोङा बदलना होगा। मित्रों, यदि हम पित्रों की पुण्य  तीथि के दिन भोजन पर व्यय होने वाली राशी को संकल्प करके रख ले एवं इसी राशी से वर्ष के किसी रविवार को जाकर उन्हे भोजन करा सकते हैं। हममें से किसी एक की शुरुवात एक और एक ग्यारह हो सकती है और ऐसा करने से उन बच्चों को प्रत्येक रविवार को अलग हट के भोजन करने का अवसर मिलेगा जो स्वास्थ की दृष्टी से भी अनुकूल होगा। कहते शिक्षा दान भी बहुत बङा दान है, पित्रों की खुशी के लिये जरूरत मंद बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करके भी उन्हे आत्मर्निभर बना सकते हैं।

हम अपने पित्रों की याद एवं उनके नाम को हमेशा स्मरणीय भी बना सकते हैं। किसी 18वर्ष से ऊपर के अनाथ बच्चे को अपनी दुकान एवं कारखाने में नौकरी देकर उसे जीवन भर के लिये रोजी-रोटी दे सकते हैं। इससे उस बच्चे में आत्म सम्मान से जीवन जीने की मानसिकता का विकास होगा जो समाज और देश के लिये हितकारी होगा। आज कई लोग पूर्वजों के नाम से प्याऊ लगवाकर, मुफ्त स्वास्थ लाभ दे कर या शिक्षा के क्षेत्र में छात्रवृत्ती की व्यवस्था करके मेघावी जरूरत मंद बच्चों को आत्मर्निभर बनाने के लिये सार्थक प्रयास कर रहे हैं। 

मित्रों, श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों को ज्यादातर भोजन करा कर ही याद करने का चलन अधिक दिखता है, मन में प्रश्न उठता है कि क्या हमारे पूर्वजों को सिर्फ भोजन की ही आवश्यकता होती है?, क्या अन्य मूलभूत आवश्यक्ताओं की पूर्ती परलोक में ईश्वर के द्वारा हो जाती है?

कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि जैसे ही हमारे बङे बूजुर्ग परलोक सिधारते हैं, उनकी सम्पत्ती को लेकर परिजनो में झगङा शुरू हो जाता है। सोचिये ऐसी स्थिती देख कर हमारे पूर्वज क्या खुश हो सकते हैं?  क्या हमारे पूर्वज ये नही चाहते कि उनके बच्चे आपस में मिल जुल कर रहें ? जिन रिश्तों से वे हमें जोङ के जाते हैं, हम उसे तो अपनेपन एवं ईमानदारी से निभा नही सकते, फिर ये भोजन कराना सिर्फ औपचारिकता ही कही जा सकती है। कहीं तो पिता के परलोक चले जाने पर उनकी जीवन संगनि, अर्थात अपनी माँ की देख भाल ही ठीक से नही करते किन्तु पिता की पुण्य तिथी पर ब्राह्म्ण को भोजन कराना नही भूलते। ये किस परंपरा का निर्वाह करके हम खुश होते हैं?

मित्रों, आज का युवा वर्ग बहुत ही समझदार है और तथ्यों के आधार पर आगे बढ रहा है। इसलिये हमें भी अपने विचारों और रुढीवादिता को तथ्यों की कसौटी पर देखना बहुत जरूरी है, वरना कहीं ऐसा न हो कि हमारी आने वाली पीढी ये समझ ले कि हमारे पूर्वज तो केवल भोजन की ही कामना रखते हैं।

हमारे पूर्वजों का सम्मान बना रहे एवं उनका आर्शिवाद हम सब पर रहे, इसी कामना के साथ एवं इस वादे से कि जिन रिश्तो से वो हमें जोङकर गये हैं, हम उन्हे प्यार और अपनेपन के साथ और मजबूत करेंगे। इसी भावांजली के साथ पूर्वजों को शत् शत् नमन है।

मैं जब भटकुँ तो सही राह दिखा देना। मेरे सर पर अपना हाँथ रख, अपने होने का एहसास करा देना।

ऊँ शान्ती

Monday, September 1, 2014

वृद्धावस्था अभिशाप नही है।



समय का चक्र अबाध गति से चलता रहता है। नियति का यही स्वाभाव है। आज जो बालक है वह कल युवा तो परसों वृद्ध होगा। यह निर्विवाद सत्य है कि वृद्धावस्था में इंसान कमजोर हो जाता है किन्तु उसका ये अर्थ कदापी नही है, कि वह बेकार हो गया। वृद्ध हमारे समाज का वटवृक्ष होते हैं, जो ताउम्र हमें हर मुसीबत से बचाते हैं।

इंसान की स्वयं की सोच उसे बूढा बनाती है। भारत में लोगों की मानसिकता है कि वे 40 वर्ष के बाद बुढे हो जाते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद तो आलम ये होता है कि वे कहने लगते हैं भाई! हम तो अब आराम करेंगे हम बुढे हो चुके। वास्तव में यही सोच इंसान को बूढा बनाती है।

वृद्धास्था अभिशाप नही है वरन् हमारे देश में वृद्धावस्था अभिशाप  पर्याय बन गई है। बदलते नैतिक मुल्यों एवं सामाजिक विघटन ने वृद्वस्था को असहनिय बना दिया है। आज की आधुनिकता से परिपूर्ण दिनचर्या में उनके लिए किसी के पास समय नही है जिससे वे अपने को उपेक्षित महसूस करते हैं। वृद्धावस्था सहज अवस्था है, और इससे सभी को गुजरना पङता है। जीवन की इस अवस्था को मनु तथा वेदव्यास की तरह सास्वत बनाना है।

21वीं शदी में वृद्धजनों को अपनी सोच में बदलाव लाना अनिवार्य है। यदि वे अपनी मजबूत सोच और संयमित, अनुशासित दिनचर्या को बनाये रखेंगे तो सदैव आत्मनिर्भर रहते हुए आने वाली पीढी को सकारात्मक संदेश देंगे। उनका जीवन भी सम्मान पूर्ण बना रहेगा। पश्चिमी सभ्यता के वायरस से ग्रसित आज की युवा पीढी को भारतीय संस्कृति का पाठ पढाने की अहम जिम्मेदारी हमारे बुर्जगों पर ही है। अपने अनुभवों और धैर्य के साथ वे दिशा भ्रमित नव यूवकों की दशा एवं दिशा बदल सकते हैं। 
किसी ने सच ही कहा है किः-  
A young man is a theory; an old man is a fact .

वृद्धावस्था आ गई है इसलिए परिश्रम करना बंद कर देना चाहिए, यह मान्यता गलत है। गतिशीलता का नाम ही जीवन है। बुढापा तो ऐसी अवस्था है, जिसमें एकांत साधाना का सुअवसर मिलता है। शारीरिक परिश्रम करना ही केवल काम नही होता बल्कि अपनी रचनात्मक उपलब्धियों से स्वयं के साथ अनेक लोगों का सहारा बना जा सकता है। ए.पी.जे. अब्दुल्ल कलाम आज भी अपने ज्ञान से युवाओं का मार्ग प्रश्सस्त कर रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है अपनी सोच को हमेशा श्रमशील बनाए रखना चाहिए। संसार में अनेक ऐसे लोग हुए हैं जिन्होने महत्वपूर्ण कार्य वृद्धावस्था में किए और ऐसी सफलता प्राप्त की जो शारीरिक शक्ति से संपन्न युवा भी नही कर पाते।
जर्मनी के राष्ट्रनिर्माता प्रिंस बिस्मार्क 80 वर्ष की उम्र में भी युवकों के समान कार्य करते थे। गाँधी जी की चाल से चाल मिलाकर चलने में युवा भी पीछे रह जाते थे। देश की आजादी में उनकी उम्र कभी भी बाधा नही बनी। देश हित के लिए 77 वर्षिय अन्नाहजारे आज भी पूरे जोश से अनशन पर बैठने का  दम रखते हैं।

गैलिलीयो 70 वर्ष के थे जब उन्होने गति के नियम की रचना पूरी की। प्लेटो का दर्शनशास्त्र 81 वर्ष की आयु में परिमर्जित हुआ। भारत की डॉ. लक्ष्मी सहगल जिन्होने सुभाषचन्द्र बोस के साथ भारत की आजादी में अपना महत्वपूर्ण सहयोग दिया था। वे 92 वर्ष की उम्र में भी सामाजिक कार्यों से जुङी रहीं और अंत समय तक डॉक्टरी सेवा के माध्यम से निरंतर क्रियाशील रहीं।

आज निदरलैंड, स्विडन, चौकोस्लोवाकिया जैसे कई देशों में वृद्धावस्था को उत्साह मय बनाने हेतु मैराथन जैसी अनेक खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही है। वृद्धों को प्रोत्साहित करने एवं ऐसी प्रतियोगिताएं रखने में जर्मनी के डॉ. वान आकेन का पूर्ण सहयोग है। उनकी मान्यता है कि प्रतिदिन 20 से 30 किलोमीटर दौङने में उम्र कोई रुकावट नही होती। दौङने की गति धीरे-धीरे बढाने से मोटापा तो भागता ही है, साथ में रुधिर तंत्र के विकार भी नष्ट हो जाते हैं।

"Age is an issue of mind over matter.
If you don’t mind, it doesn’t matter."

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करके इंसान अपने को वृद्धावस्था के अभिशाप से मुक्त कर सकता है।

फिल्मी पोस्टर






भारतिय सिनेमा अपने सौ वर्षों के सफर का जलसा मना रहा है। सौ वर्षों के सफर में कई नई चीजें जुङी तो कई पुराने तरीके आधुनिक तकनिकों के शिकार भी हुए। डिजीटल युग ने तो हाथ से बने  फिल्मी पोस्टर्स को गुजरे जमाने का अक्स बना दिया। पोस्टर बनाना श्रम-साध्य काम होता था। जिसके एवज में बनाने वाले को मेहनताना मिलता था, जो रचनात्मक कला से पूर्ण रोजगार होता था। किसी भी चेहरे को उसके मूल रूप में कागज पर उकेरना आसान नही होता था। बॉलीवुड में कई नामचीन लोगों ने इस विधा में काम किया, जो समय के परिर्वतन के साथ गुमनामी में खो गये। परन्तु चित्रकार एफ.एम. हुसैन तथा डी.आर.भोसले का नाम आज भी आदर से लिया जाता है। उनकी कार्यशैली एक अलग अंदाज में थी।

1924 में भारत में  पहली बार 'कल्याण खजिना' फिल्म का पोस्टर बना था। ये फिल्म शिवाजी के जीवन पर बनाई गई थी।  इसके पोर्स्टस बाबुराव पेंटर ने बनाए थे। संसार का पहला फिल्मी पोस्टर 1890 में एक लघु फिल्म प्रोजेक्शन 'आर्टटिकुएस' के लिए फ्रेंच चित्रकार जुल्स चेरेट ने बनाया था। 1913 में भारत की निर्मित पहली फिल्म का पोस्टर तस्वीर विहीन था। उस समय पोस्टर कैनवस पर हांथ से पेंट किये जाते थे। फिल्मो के प्रचार प्रसार में फिल्मी पोस्टर्स का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

1930 से लेकर 1960 के फिल्मी पोस्टर्स काफी चर्चा में रहे। संसार में लुप्त होती इस कला के कुछ पारखियों ने 2007 में  फिल्मी पोस्टर्स पर लगी प्रदर्शनी को सफल बनाया। इस प्रर्दशनी में  डी.आर.भोसले द्वारा बनाया गया गाइड का पोस्टर दो हजार डॉलर में बिका।  हॉलीवुड में कुछ समय पूर्व 'द साइलेन्स एंड द लैम्ब' फिल्म के पोस्टर को 35 साल का सबसे शानदार फिल्मी पोस्टर माना गया है।

आज नई पीढी अपनी इस लुप्त हेती सांस्कृतिक धरोहर को लेकर सजग है। हितेश जेठवानी जैसे कुछ लोग हस्तनिर्मित पोस्टर्स को हिप्पी डॉट संस्था के जरिये बढावा दे रहे हैं। ओसियन संग्रहालय में सदियों पुराने लगभग 19,500 पोस्टर्स सुरक्षित रखे गये हैं.। पश्चिमी देशों में बसे कला प्रेमियों के लिए भारतीय फिल्मी पोस्टर्स का विशेष महत्व है। एक दुकानदार द्वारा पाँच रूपये में खरीदे 'मदर इण्डिया' के एक पोस्टर को विदेश में लगभग 6 हजार में बेचा गया था।  फिरभी लगातार लुप्त होती प्रजातियोॆ की तरह ही फिल्मी पोस्टर्स का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है क्योंकि पोस्टर्स का सिधा रिश्ता प्रचार और एडवरटाइजिंग से होता है।
यदि सरकार और फिल्मी क्षेत्र के जागरूक लोग इन पोस्टर्स को सहजने का बीङा उठाएं तो निःसंदेह लुप्त होते पोस्टर्स फिर से जिवित हो जायेंगे और हजारो कलाकारों के हाथ को रोजी-रोटी का आधार मिल जायेगा।

Wednesday, July 9, 2014

सीखना सफलता की कुंजी है (Learning)

सीखना सफलता की कुंजी है (Learning)



सीखने की कोई उम्र नही होती है। जो ताउम्र सीखने में यकीन रखते हैं, वही बुलंदियों पर पहुँचते हैं। डार्विन के सिद्धान्त को यदि आज के माहौल में सोचे तो उसकी महत्ता और भी बढ जाती है। आज वही सरवाइव कर सकता है जो नए माहौल के अनुसार अपना विकास करता है। सीखना किसी भी विकास की सतत प्रक्रिया है। परिस्थिती के अनुसार नित नई चीजों को सीखना और स्वयं को उमसें ढाल देना सफलता की कुंजी है। कुछ नया सीखने की ऊर्जा हम सभी में छुपी होती है, जो इस ऊर्जा को इस्तेमाल कर लेते हैं वे सफलता की इबारत लिखते हैं तथा देश एवं विदेश में भी सम्मानित किये जाते हैं। उम्र की बाधाओं को तोङकर भारत की एक नारी आशा खेमका ने ब्रिटेन में भारत को गौरवान्वित किया।  

आशा खेमका का जन्म बिहार के सीतामढ़ी जिले में हुआ था। उनकी शादी महज 15 साल की उम्र में हो गई थी। 1975 में अपने पति और तीन बच्चों के साथ 25 वर्ष की उम्र में आशा खेमका ब्रिटेन चली गईं। उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, पर उन्होंने सांस्कृतिक और भाषाई बाधाओं को पार किया।  1980 के दशक में आशा ने स्वयं को सुशिक्षित बनाने की शुरूआत की। दृण इरादों वाली आशा खेमका ने बच्चों के टीवी शो को देखकर और युवा माताओं से बात कर अंग्रेजी सीखी। नई चीजों को सीखना और ईमानदारी से शिक्षा ग्रहण करने का ही परिणाम है कि उन्हे ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार डेम कमांडर ऑफ द आर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही आशा खेमका अपने समुदाय से यह सम्मान प्राप्त करने वाली प्रथम व्यक्ति बन गई। यह ब्रिटिश साम्राज्य के महिला नाइटहुड सम्मान के बराबर है।  उन्हें यह सम्मान पिछले आठ वर्ष से वेस्ट नोटिंघमशायर कॉलेज में बतौर प्राचार्य वेस्ट मिडलैंड के पिछड़े इलाके में सेवाएं देने को लेकर सम्मानित किया गया।



प्रथम महिला आई. पी. एस. किरण बेदी का कहना है कि- "जिंदगी का हर पल कुछ न कुछ सिखाता है। यदि निरंतर कुछ नया नही सीखेंगे, तो जल्दी ही बेकार साबित हो जायेंगे।"

ज्यादातर महिलाओं की सोच होती है कि शादी हो गई, बच्चे हो गये बस दुनिया यहीं खत्म, उन्हे आशा खेमका से सबक लेना चाहिए। कहते हैं फिल्मो का असर समाज पर पङता है और फिल्में समाज का आइना होती हैं। यदि दोनो ही बातों पर ध्यान दें तो 2012 में प्रर्दशित फिल्म इंग्लिश विंग्लिश में श्री देवी द्वारा अभिनित रोल महिला के उस पक्ष को सबल बनाता है जो कुछ सीखना चाहती हैं। विपरीत परिस्थिती में भी अवसर को समझते हुए विदेशी धरती पर इंग्लिश सीखती है। कहने का आशय ये है कि, परफैक्ट कोई नही होता इसलिए जो नही आता है उसे सीखने में संकोच नही करना चाहिए। किसी कार्य का न आना इतने शर्म की बात नही होती बल्कि उस कार्य को न सीखने की चाह शर्म की बात होती है।

दोस्तों, नए लोग और नई जमीं पर आशा खेमका ने अपने सीखने के जुनून को आगे बढाया। सीखने का पैशन ही इंसान को जीवन में आगे बढने में मददगार होता है। यदि मनुष्य सीखना चाहे, तो अपनी भूल से भी सबक ले सकता है। बच्चों से लेकर बङों तक, विद्यार्थियों से लेकर सेवानिवृत्त लोगों तक हर किसी को जीवन का प्रत्येक क्षेत्र हर दिन कुछ न कुछ सबक सिखाता है। ये हमपर निर्भर करता है कि हम सीखने की आदत को कितना दृण रखते हैं। सफल व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण सबक है सीखना, जिसको अपनाते हुए हमसब अपने जीवन को रचनात्मक और सकारात्मक बना सकते हैं।
ए.पी.जे.अब्दुल्ल कलाम का कहना है कि,  

      Learning gives creativity,
            Creativity leads to thinking,
            Thinking provides knowledge,
            Knowledge makes you great.