Sunday, October 11, 2015

साहस और आत्मविश्वास


मित्रों, जीवन में कई बार परिस्थिती हमारे अनुकूल नही होती। अक्सर कुछ कठिन परिस्थितियाँ हमारे साहस और विश्वास की परिक्षा लेती रहती हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि, समस्याएं समुंद्र की तरह विशाल और उसकी प्रचंड लहरें सब कुछ तहस-नहस कर देंगी। ऐसी परिस्थिती पर विजय पाने के लिए हमें साहस के साथ अपने आत्मविश्वास के बल पर इससे मुकाबला करना चाहिए क्योंकि साहस और आत्मविश्वास वो शक्ति है जिससे सभी परेशानियों को दूर किया जा सकता है। ये वो आधार हैं, जिससे दृणइच्छाशक्ति को बल मिलता है। 

चर्चित मनोवैज्ञानिक लुईस एल के अनुसार, यदि व्यक्ति को कामयाबी हासिल करनी है तो, साहस के साथ आत्मविश्वास के कवच को धारण करना ही होगा। काम कोई भी हो उसमें दिक्कतें न आएं ये तो संभव नही है किन्तु परेशानियों को आत्मविश्वास के साथ पार करना संभव है। यदि हम ह्रदय में अविश्वास और विफलता का डर लाते हैं तो कभी भी सफल नही हो सकते। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो ये दर्शाते हैं कि, निडरता और विश्वास से सफलता की राह आसान हो जाती है। शिवाजी और रानी लक्ष्मीबाई के विश्वास भरे साहस से मुगलों और अंग्रेजों के हौसले भी परास्त हो गये थे। विलियम पिट को जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पद से हटाया गया था, तब उन्होने डेवेनशायर के ड्यूक से निडरता के साथ कहा था कि, इस देश को मैं ही बचा सकता हुँ, इस कार्य को मेरे सिवाय दुसरा कोई नही कर सकता। 11 हफ्ते तक इंग्लैंड में उनके बिना काम चला लेकिन अंत में पिट को ही योग्य मानते हुए उन्हे प्रधानमंत्री बनाया गया। कोलंबस ने अपने साहस और विश्वास के बल पर अमेरीका की खोज की। घनश्याम दास बिङला की शिक्षा सिर्फ पाँचवी तक हुई थी। लेकिन उनके मन में एक सफल उद्योग करने का जज़बा था। उन दिनो जूट का व्यपार केवल अंग्रेज करते थे। अंग्रेजों ने बिङला को कर्ज देने से भी इंकार कर दिया। उन्हे मशीने भी दुगने दाम में खरीदनी पङी, फिर भी साहस और आत्मविश्वास के धनी बिङला ने सभी मुश्किलों का डटकर सामना किया, नतिजा आज सब जानते हैं। बिङला ग्रुप आज प्रतिष्ठित और संपत्तिशाली उद्योग घराना है। 

मित्रों, खुद पर अटूट विश्वास और आगे बढने का साहस ही हमें सफलता का एहसास कराता है। व्यक्ति जब स्वंय पर विश्वास करता है तो उसका आत्मबल प्रकट होता है। शक्तियाँ और क्षमताएं तो हर किसी में मौजूद होती हैं, सिर्फ उसे पहचानने की जरूरत है। अपनी क्षमताओं को जानकर ही हम बेहतर विश्व का निर्माण कर सकते हैं और ये तभी संभव है जब हम अपने विश्वास को साहस के साथ व्यवहार में लायेंगे। आत्मविश्वास भी तभी मजबूत होता है जब हम निडरता के साथ सभी बाधाओं को फेस करते हैं। दुनिया भी उसे ही याद रखती है जो साहस और आत्मविश्वास के साथ अपना रास्ता खुद बनाता है। जीवन की अनेक बाधाओं के बावजूद साहस,  दृणता और  विश्वास  के साथ लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। 

किसी ने सच ही कहा है,  मुश्किलों से डर के भाग जाना आसान होता है। हर पहलु जिंदगी का इम्तहान होता है। डरने वालों को मिलता नही जिंदगी में कुछ, साहस और आत्मविश्वास के साथ आगे बढने वालों के कदमों में जहान होता है। 


Thursday, September 17, 2015

राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है, हिन्दी

वसुधैव कुटुम्बकम की भावना की अलख जलाती हमारी हिन्दी भाषा, दक्षिण से उत्तर तक तथा पश्चिम से पूरब तक  राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।  परंतु भारत की आजादी के 68 वर्ष बाद भी हिन्दी भाषा को लेकर कई राज्यों में विवाद चल रहा है जबकि संविधान के अनुसार 14 सितंबर 1949 को अनुछेद 343 एक  के अनुसार  हिन्दी को राजभाषा घोषित किया गया तथा ये 26 जनवरी 1950  से अधिकारिक तौर पर बोली जाने वाली भाषा बन गई।  संवेधानिक दर्जा प्राप्त हिन्दी को अभी भी  यदा-कदा अग्नि परिक्षा से गुजरना पङता है। विश्व स्तर पर अग्रसर हिन्दी अपने ही देश में अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है।

संत कनफ्यूशियस के अनुसार, "अपनी भाषा हीन होने से कोई देश आजाद नही रह सकता।" 

संविधान के अनुसार हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है और हम 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की दासता से आजाद भी हो गये। अंग्रेज भारत छोङकर चले भी गये किन्तु उनकी अंग्रेजी के हम अभी भी गुलाम हैं। स्वतंत्रता के संघर्ष में जनमानस की भाषा, गाँधी, टैगोर, तिलक, दयानंद सरस्वति, एवं सुभाष चंद्र बोस जैसे व्यक्तित्व वाले लोगों की भाषा हिन्दी को आज भी वो स्थान नही मिल सका जिसकी वो हकदार है। ये अजीब विडंबना  है कि आजादी के साठ दशक बाद भी स्वंय सिद्धा हिन्दी पूर्णतः सरकारी काम-काज की भाषा का सम्मान न पा सकी।

महात्मा गाँधी ने कहा था कि, "राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है।" 

इतिहास गवाह है कि, हमारे कई मुस्लिम शासकों ने हिन्दी को अपने कामकाज की भाषा माना था। मौहम्द गौरी ने अपने राजकीय काम-काज को देवनागिरी तथा हिन्दी में संपादित करने के आदेश दिये थे। उसने सिक्कों पर देवानागीरि में 'श्री हम्मी तथा मेहमूद साँब' अंकित करवाया था। शेरशाँह सूरी ने भी अपने शासन काल में सिक्कों पर देवनागिरी में 'श्री हम्पी तथा ऊँ' अंकित करवाया था। उनके शासन काल में परोक्ष तथा अपरोक्ष रूप से शासन का कार्य हिन्दी में किया जाता था। 18वीं शताब्दी में पेशवा, सिंधिया और होलकर जैसे मराठी राजघरानो में हिन्दी में ही कामकाज होता था। अनेक संतो जैसे नामदेव, चैतन्य महा प्रभु, गुरु नानक ने अपने उपदेश हिन्दी में दिये थे क्योकि हिन्दी जन-साधारण की भाषा थी। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि, हिन्दी भाषा प्राचीन काल से सभी प्रान्तों को एक दूसरे से जोङे हुए है। आजादी का संदेश लिये हिन्दी भाषा ने सभी देशभक्तों को एक सूत्र में बाँधा था। 

दयानंद सरस्वती ने कहा था कि, "हिन्दी ही राष्ट्रीय एकता को शास्वत और अक्षुणं बना सकती है।"

एक सर्वे के अनुसार 24 प्रतिशत साक्षर लोगों में से केवल दो प्रतिशत ही लोग अंग्रेजी जानते हैं क्योंकि अंग्रेजी में नरेशन की दिक्कत है जबकि हिन्दी नरेशन की बला से मुक्त है। हमारी हिन्दी भाषा में बङों का सम्मान लिए 'आप' जैसे शब्द है, जबकि अंग्रेजी ने तो सभी को एक ही शब्द 'यू' (You)  के साँचे में कैद कर दिया है। समय के बंधनो से मुक्त हिन्दी भाषा में हमारी अभिवादन शैली, प्रणाम और नमस्कार नम्रता का प्रतीक है। हिन्दी समृद्ध और सर्वग्राही भाषा है। 

आचार्य केशवचन्द्र सेन के अनुसार, "भारत जैसे देश में जहाँ अनेक बोलियां बोली जाती हैं वहाँ हिन्दी ही सम्पर्क, सर्वसुलभ ओर सार्वभौमिक भाषा सिद्ध होती है। ये राष्ट्रीय एकता और अखंडता की प्रतीक है।" 

आजादी से पूर्व हम सब एक भाषा हिन्दी के साथ, एक उद्देश्य के लिए अंग्रेजों के खिलाफ थे, परंतु आज के परिवेश में कुछ राजनैतिक गतिविधियों ने भारत को अनेक राज्यों में बाँट दिया है, वहाँ की क्षेत्रिय भाषाएं अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने लगी हैं। आज जिसे देखो वो अपने को पहले पंजाबी, बंगाली, मराठी, कन्नण, मद्रासी आदि कहते हुए मिल जायेगा, बहुत कम ही लोग स्वंय को भारतवासी या हिन्दुस्तानी कहते हुए मिलते हैं। भाषाई विवाद का ही परिणाम है, अनेक राज्यों का स्वतंत्र उदय।मित्रों, भाषा पर कुठाराघात किसी भी राष्ट्र के लिए हितकर नही होता और राष्ट्र से बढकर किसी भी भाषा का कोई स्वाभीमान नहीं होता।  

भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ के लिए कहा जाता है कि चार कोस पर भाषा बदले छः कोस पर पानी, वहाँ सभी को एक सूत्र में बाँधना आसान नही है किन्तु सभी भाषाओं का मिश्रित रूप और संतो की वाणी से अलंकृत संवेधानिक भाषा हिन्दी राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाये रखने में सक्षम है क्योंकि हिन्दी भाषा सद्भावना, प्रेम, श्रद्धा तथा अहिंसा, करुणा एवं विश्व मैत्री का प्रतीक है। 

वर्तमान में गूगल जैसे सर्चइंजन भी हिन्दी के विकास को समझते हुए अपनी कार्य प्रणाली को हिन्दी में भी उपलब्ध करा रहे हैं। हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनने को भी अग्रसर है। अतः मित्रों विश्व स्तर पर अपना वर्चस्व रखने वाली हिन्दी भाषा को हम सब मिलकर वैश्विक मानचित्र पर नम्बर एक पर ले जाने का प्रयास करें और गर्व से हिन्दी भाषा को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनायें। 



ए.पी.जे.कलाम और ह्वीलर द्वीप




मित्रों, अभी हाल में ही उड़ीसा सरकार ने ह्वीलर द्वीप का नाम हम सबके प्रिय अब्दुल कलाम साहब के नाम कर दिया है। उनके सम्मान में ये कदम बहुत प्रशंसनिय है। ह्वीलर द्वीप से कलाम साहब का क्या नाता रहा है?  इसके बारे में आप सबसे कलाम साहब के संस्मरण को साझां करना चाहेंगे, जो उन्होने अपनी पुस्तक टर्निंग प्वाइंट में उल्लेखित किया है। 

मिसाइल मैन अब्दुल कलाम साहब अपनी पुस्तक में  जिक्र करते हैं कि, 'ये उन दिनों की बात है जब पृथ्वी मिसाइल का सफल परिक्षण हुआ था।इसी के साथ सेना की एक और जरूरत सामने आई जिसमें उन्हे जमीनी क्षेत्र के लिये एक आधुनिक यंत्र की आवश्यकता थी। जिसके लिये हम लोग जिस मरुस्थली क्षेत्र में अपने परिक्षण कर रहे थे, वह सुरक्षा व अन्य कारणों से उपयुक्त नही था। हमें अपने इस काम के लिये पूर्वी तटिय क्षेत्र के किसी निर्जन द्वीप की जरूरत थी।


भू जलीय नक्शे में हमें उड़ीसा तट पर कुछ निर्जन द्वीप नजर आये। वहाँ भू भागों की सम्भावना थी। हम अपनी टीम जिसमें  डॉ़ एस.के.सलवन तथा डॉ. वी.के. सारस्वत शामिल थे। धमरा से एक नौका किराये पर ली गई और हम सब द्वीप की तलाश में निकल पड़े। नक्शे पर इन द्वीपों के संकेत 'लौंग ह्वीलर', 'कोकोनट ह्विलर' और 'स्मॉल ह्विलर' के नाम से लिखे हुए थे। टीम ने एक कमपास( दिशासूचक यंत्र) लिया और यात्रा पर निकल पड़े। टीम रास्ता भटक गई उसे ह्वीलर द्वीप नही मिला लेकिन सौभाग्य से , उन्हे कुछ मछुआरे अपनी नौकाओं में दिखे। उनसे रास्ता पूछा गया। उन मछुआरों को ह्वीलर द्वीप का  तो पता नही था लेकिन उन्होने चन्द्रचूड़ नाम के एक द्वीप का जिक्र किया। मछुआरों ने सोचा कि ये लोग इसी द्वीप का पता पूछ रहे हैं। उन्होने चंद्रचूड़ द्वीप का पता बता दिया। उनके बताये हुए  रास्ते से टीम चंद्रचूड़ पहुंची और बाद में पता चला कि वही स्मॉल द्वीप है और वहाँ हमारी जरूरत भर जगह पर्याप्त है।

उस द्वीप को पाने के लिये हमें उड़िसा नौकरशाही का सामना करना पड़ा। यह जरूरी हुआ कि इसके लिये उड़िसा के तत्कालीन (1993) मुख्यमंत्री से राजनितिक निर्णय पाया जाये। उस समय शक्ति सम्पन्न नेता बीजू पटनायक मुख्यमंत्री थे। उनके कार्यालय से संकेत मिल रहा था कि वह द्वीप किन्ही कारणों से उपलब्ध नही हो पायेगा। खैर हमारी विनय स्वरूप हमें बीजू पटनायक से भेंट करने का अवसर मिला। जब हम उनके कार्यालय में पहुँचे तो फाइल उनके सामने रखी हुई थी। उन्होने कहा, 'कलाम, मैने ये पाँचो द्वीप डी.आर.डी.ओ. को बिना किसी किमत के देने का फैसला लिया है, लेकिन मैं इस फाइल पर अपनी स्वकृति हस्ताक्षर तभी करुंगा जब तुम्हारी ओर से  एक वादा किया जायेगा। उन्होने मेरा हाँथ अपने हाँथ में थाम कर कहा, ' तुम्हे एक मिसाइल ऐसी बनानी पड़ेगी जो दूर के दुश्मनों से भी हमारी रक्षा कर सके'। मैने कहा, 'सर, हम जरूर इसपर काम करेंगे। मैने तुरंत रक्षा मंत्री को सूचना दी। मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर होने के बाद हमें स्मॉल द्वीप मिल गया।
  
पाठकों इस प्रकार कलाम साहब के अनुरोध पर ये द्वीप डी.आर.डी.ओ. को रॉकेट प्रक्षेपण के लिये उपलब्ध हो सका। उनके महत्वपूर्ण प्रयासों से आज ये द्वीप विश्व के महान प्रक्षेपात्रों में शामिल है।

2 दिसंबर 2014 को परमाणु सक्षम अग्नी IV मिसाइल का परिक्षण उङीसा के ह्वीलर द्वीप के एकीकृत परिक्षंण रेंज से किया गया था। नि:संदेह ह्विलर द्वीप का नाम 'कलाम द्वीप' हो जाने से देश के युवाओं और वैज्ञानिकों को प्रेरणा मिलेगी।

आज के बालक भारत का भविष्य हैं


मित्रो, जिस तरह से आज समाज में बाल अपराध बढ रहे हैं और नाबालिग बच्चे, ऐसे जघन्य अपराध को अंजाम दे रहे हैं, वो  किसी भी सभ्य समाज के लिये कलंक से कम नही है। आज के वातावरण को देखते हुए किशोर न्याय अधिनियम 2014 संशोधन बिल पर कैबिनेट की मोहर एक सार्थक कदम है। पिछले कुछ वर्षों से नाबालिग बच्चों द्वारा हत्या, दुश्कर्म तथा तेजाबी हमले तेज हुए हैं लेकिन उन्हे पुराने अधिनियम के अनुसार सख्त सजा का प्रावधान नही था जिससे अपराधिक मानसिकता की प्रवृत्ति ने निर्भया जैसी घटना को अंजाम दिया। आज भी देश निर्भया कांड को याद करके सिहर जाता है। आठवीं में पढने वाला बालक अपनी शिक्षिका की रिवाल्वर से हत्या कर देता है तो कहीं 10 से 12 वर्ष के बालक अपने साथी का अपहरण करके उसकी हत्या कर देते हैं। पिछले कुछ वर्षों से तो,  लङकियों और महिलाओं पर नाबालिग किशोरों द्वारा तेजाबी मानसिकता का कहर कुछ ज्यादा ही हो रहा है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि, किसी भी अपराध की सजा उसकी जघन्यता के आधार पर होनी चाहिये न की उम्र या लिंग के आधार पर । जिस दिन जे जे एक्ट संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लग जायेगी उस दिन से शायद इस तरह के अपराध में कमी आयेगी।

दोस्तों, मेरे मन में बाल अपराध को लेकर कुछ मंथन चल रहा है इसलिये मैने अपनी पूर्व की लाइन में शायद शब्द का इस्तमाल किया है क्योंकि ये जो बाल अपराध का ग्राफ दिन-प्रतिदिन बढ रहा है, उसके लिये जिम्मेदार क्या सिर्फ नाबालिग बच्चे हैं ! या समाज और परिवार भी। आज हम सब एक सभ्य सुंदर और सुसंस्कृत भारत की कल्पना करते हैं।  सुरक्षित वातावरण की भी कामना रखते हैं किन्तु अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को दरकिनार कर देते हैं। मेरा मानना है कि, कोई भी शिशु जन्म से अपराधी नही होता उसके लिये अनेक कारण समाज में विद्यमान हैं। हमारा कानून भी इस बात को मानता है कि,  बालकों में बढ रही अपराधिक मनोवृत्ति के पीछे सामाजिक ढांचा भी जिम्मेदार है। आज तो आलम ये हो गया है कि, संभ्रान्त परिवार के बालक भी अनेक अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। किसी भी समाज की पहली ईकाइ होती है परिवार जहाँ बालक का प्रारंभिक विकास होता है। आज-कल अक्सर  देखने को मिल रहा है कि, बच्चे की परवरिश बहुत आधुनिक ढंग से हो रही है। वास्तव में (Actully) आधुनिकता गलत नही है बल्कि आधुनिकता का अधुरा ज्ञान दिमक की तरह समाज को खोखला कर रहा है। आज बच्चों के हाँथ में इंटरनेट से सुसज्जित मोबाइल, आई पेड और स्कूल जाने  के लिये बाइक या कार कानूनी उम्र सीमा से पहले ही परिवार द्वारा मिल जाती है। यदि स्कूल या ट्राफिक नियम इसे रोकते हैं तो परिवार द्वारा हर्जाना भर दिया जाता है। ऐसे ही छोटे-छोटे अपराधों को कई परिवारों का सपोर्ट मिलता है और बच्चों का कानून से डर खत्म हो जाता है। इसके अलावा समाज में व्याप्त फिल्मों तथा विज्ञापनों का खुलापन एक नासूर की तरह अपरिपक्व बच्चों को डस रहा है। जिसका परिणाम आज का बढता बाल-अपराध है। यदि शुरुवात में ही छोटे-छोटे अपराधों को अभिभावकों द्वारा रोका जाए तो एक हद तक बच्चों में सुधार लाया जा सकता है। 

आज के बालक  हमारे भारत देश का भविष्य हैं। अतः हम सबको मिलकर भविष्य के कर्णधार की नींव को सुसंस्कारों से पल्लवित करना है। बाल्यकाल की गलतियों को बढावा देने की बजाय समय रहते ही उसे सुधारना हम सबकी नैतिक और आवश्यक जिम्मेदारी है।

Children are like different type of flowers, So irrigate them good manners and make this world a beautiful garden

Saturday, July 11, 2015

HAPPY RAINY DAY


गर्मी की तपिश के बाद बारिश की बूंदे जीवनदायनी होती हैं। मुरझाए हुए पेङ-पौधों में जान आ जाती है। चारो तरफ की हरियाली देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो पेङ-पौधे बारिश का स्वागत कर रहे हों। नाचते हुए मोर,  कोयल की बोली तथा पक्षियों का कलरव मौसम के ताल को और भी संगीतमय कर देते हैं। किसान के लिए बारिश ईश्वरीय वरदान की तरह होती है, तो वहीं  धरती के सभी सजीव जगत के मन को सावन की बूंदे हरा-भरा कर देती है। 

बरखा रानी आई कर सोलह श्रंगार।
मेघों की काली साङी और बिजली की पायल पहने लगती अति सुंदर।
रह-रह कर वह बरसाती ऐसी रसधार कि मगन हो नाच उठे सारा संसार।

भारतीय सिनेमा ने भी  बरसात को और भी मनोहारी बना दिया है। बारिश की बूंदो से तरबतर लोग स्वतः ही बरसात के गानो को गुनगुनाने लगते हैं। बच्चों के लिए तो मानो मौज-मस्ती की बरसात हो जाती है, अधिक बारिश से स्कूल की छुट्टी और फिर कागज की नाव बनाकर पानी में तैराना कितना खुशनुमा नजारा होता है, जहाँ न कोई चिन्ता न कोई फिकर बस फुल टू मस्ती।

रिमझिम बारिश के साथ अदरक की चाय और पकोङे का कॉम्बिनेशन तो हर दिल अजीज होता है। कई जगहों पर तो सिर्फ बरसात में बनने वाले झरने लोगों के लिए पिकनिक स्पॉट बन जाते हैं। हर तरफ प्रकृति अपनी रिमझिम फुहार से गमों की तपिश को भी राहत दे देती है और त्योहारों की भी खुशनुमा शुरुवात हो जाती है। सावन में  राखी, तीज, कजरी और हर-हर महादेव की गूंज वातावरण को पवित्र उल्लास से तरबतर कर देती है।

ये बारिश की बूंदे एक तरफ तो हरियाली तो दूसरी तरफ प्रेम का संदेश भी देती हैं। किसी को चुङी में तो किसी को पायल में अपने साथी की आवाज सुनाई देने लगती है। धरती पर पङने वाली बूंदो से सोंदी-सोंदी मिट्टी की खुशबु वातावरण को अपने आने का एहसास करा देती है। कहते हैं कुदरत के कणं-कंण में संगीत बसता है, ये बातें बरसात में शत् प्रतिशत सच हो जाती हैं जब बादलों की गरज और बिजली की चमक के साथ पानी की बूंदे नृत्य करती हुई झरनों के माध्यम से प्रकृति को और भी मनोहर बना देती हैं। कवियों की कलम तो बारिश की बूंदो से ऐसी सम्मोहित हो जाती हैं कि कवि की कल्पना को कविताओं में अभिव्यक्त करने को आतुर हो जाती हैं। किसी ने सच कहा है कि,  "Rain is not only drops of water, It is the Love of Sky for Earth."

Enjoy the Love of Nature
Happy Rainy Day

Friday, July 10, 2015

डिजिटल इंडिया


मित्रों, आज हम सब विज्ञान की आधुनिक टेक्नोलॉजी के गिरफ्त में इस कदर आ चुके हैं कि सुबह की पहली किरण का एहसास whatsapp की good morning के message से होता है। मोबाइल और लेपटॉप तो जीवन सें सांस की तरह घुल चुके हैं। फेसबुक पर मिलने वाले लाइक, लाइफ सर्पोट सिस्टम बन गये हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा डिजिटल इडिया की शुरुवात एक ऐसा ई सपना है जिसे समस्त भारत देख रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंक के काम और बाजार यहाँ तक की मेल मिलाप भी इंटरनेट के माध्यम से हो रहे हैं। जिन लोगों से फेस टू फेस बात किये मुद्दतें बीत गईं, उन सभी की उपस्थिति फेसबुक पर अपने होने का एहसास करा देती है।

आज के इस ई युग में बुद्धिमता का पैमैना भी बदल गया है। बच्चों की परवरिश का तरीका भी बदल रहा है। नित नये इज़ात होते एप ने माँ की लोरी का स्थान भी ले लिया है। डिजिटल क्लासेज ने बस्ते का भार कम कर दिया है। यदि वास्तविकता के चश्में से देखें तो, बच्चों का बचपन दूर हो रहा है। आजकल बच्चे जानकारियों को याद करने के बजाय गुगल या विकीपिडिया पर ढूंढना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जहाँ एक ही जानकारी कई लोगों द्वारा अपलोड होने से उसमें थोङा बहुत अंतर भी होता है। ऐसे में वास्तविक ज्ञान में कनफ्यूजन होना स्वाभाविक है।

दोस्तों, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि जिन गुगल पर भारत या अन्य देश के बच्चे इतने व्यस्त हैं, उस गुगल में काम करने वाले 80% पेशेवरों ने अपने बच्चों को टी.वी., इंटरनेट तथा कम्प्यूटर से दूर रखा है। एकबार एपल के स्टीव जॉब्स से एक पत्रकार ने पूछा कि, आपके बच्चे तो आईपेड को बहुत पसंद करते होंगे ? स्टीव ने जवाब दिया, नहीं उन्होने इसे यूज नहीं किया। घर पर बच्चे टेक्नोलॉजी का उपयोग कितना करेंगे, यह हम तय करेंगे।
माइक्रोस़ॉफ्ट कंपनी के पिएरे लॉरेंट भी बच्चों के लिये इस तरह के गैजट पर रोक लगा रखे हैं। अमेरिका की सिलिकॉन वैली में एक ऐसा स्कूल है, जहाँ 12 साल तक के बच्चों को कम्प्युटर, मोबाइल और टेबलेट जैसे आधुनिक उपकरणों से दूर रखा जाता है। कक्षाओं में ट्रेडीशनल तरीके से ब्लैक बोर्ड, फिजिकल एक्टिविटीज, क्रीएटिविटी और एक्सपेरिमेंटल लर्निंग से पढाया जाता है। सबसे खास बात इस स्कूल की ये है कि, इस स्कूल में गूगल तथा माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के आल्हा दर्जे के कर्मचारियों के बच्चे पढते हैं। यहाँ कल्पनाशीलता को तवज्जोह दी जाती है।

सोचिये! हमारे देश भारत में भी गुरुकुल शिक्षा हुआ करती थी जहाँ बच्चे को विषणु शर्मा जैसे शिक्षक पढाते थे। बात करें राम या कृष्ण की तो उन्होने भी राजशाही ठाठ छोङकर प्रकृति की गोद में व्यवहारिक तौर से शिक्षा ग्रहण की थी। आज भारत का परिवेश इतना आधुनिक हो गया है कि, ई बैग स्कूल स्टेटस सिंबल बन गया है। ऐसे में मोदी जी का ई बैग स्कूल का कंसेप्ट भारत को किस दिशा में ले जायेगा उसका अंदाजा भी लगाना मुश्किल है। एसोचैम के सर्वे के मुताबिक भारत में 8-13 साल के करीब 73% बच्चे इंटरनेट पर सक्रिय हैं। शहरी इलाकों में लगभग 3 करोङ बच्चों के पास अपना मोबाइल है। 3 से 7 साल के बच्चे सोशल मिडिया पर रोज औसतन 3 से 4 घंटे गुजारते हैं और औसतन 4 घंटे टीवी देखते हैं। इसका भयानक परिणाम है छोटी सी उमर में डायबिटीज और मोटापा। आँखों पर चश्मा भी आम बात हो रही है क्योंकि बच्चे टीवी बहुत पास से देखते हैं। एक शोध के मुताबिक गैजेट्स के अधिक इस्तेमाल से बच्चों के दिमाग पर नकारात्मक असर होता है। डिजिटल इंडिया का सपना भारत के भविष्य को समय से पहले ही बङा बना रहा है। विकास के इस क्रम में डिजिटल इंडिया का होना एक आवश्यक कदम है लेकिन जिस तरह हमारे संविधान में हर कार्य के लिये तय उम्र सीमा है, जैसे कि वोट देने का अधिकार, शादी का अधिकार उसी तरह इंटरनेट या मोबाइल को यूज करने की भी तय उम्र सीमा होनी चाहिये। वरना बच्चों की मासूमियत कब बङी होकर अनेक ऐसी अपराधिक गतिविधियों के गिरफ्त में आ जायेगी कि उसे सुधारना भी मुश्किल हो जायेगा।

दोस्तों, इंटरनेट और मोबाइल के कई फायदे हैं तो दुष्प्रभाव भी कम नहीं हैं। आज हम दूर देश में बैठे व्यक्ति से तो बात कर सकते हैं लेकिन पास बैठे अपनों से दूर हो रहे हैं। हर व्यक्ति मोबाइल पर मेसेज पढने में इतना व्यस्त है कि उसे याद भी नहीं कि कब उसने परिवार के साथ बैठकर हँसी-मजाक या गपशप की हो, ऐसे माहौल में पारिवारिक संबंधों पर नकारात्मक असर पङता है। इंटरनेट की लत से नई मानसिक बिमारी का जन्म हो रहा है, जिसे नेटब्रेन नाम दिया गया है। बच्चे हों या बङे आज लगभग हर कोई ई गैजेट्स के नशे का शिकार हो रहा है, जिसका समय रहते उपचार आवश्यक है। डिजीटल इंडिया के माध्यम से भारत का स्वर्णिम सपना साकार हो सकता है, लेकिन इसके लिये हमारी नीव प्राकृतिक और स्वाभाविक होनी चाहिये। 

धन्यवाद

Thursday, February 26, 2015

सफलता के रास्ते में प्रोत्साहन एक अचूक औषधी है


मित्रों, सामान्यतः सभी लोगों में और उनके कार्यों में अच्छाईयां और कमियां दोनो होती है। कोई भी परफैक्ट नही होता। फिर भी अक्सर देखा जाता है कि, लोग कमियों को ज्यादा हाईलाइट करते हैं क्योंकि उनके विचार से यदि कमियों को ज्यादा दिखाएंगे तो व्यक्ति अपनी गलतियों को सुधार लेगा। परंतु सच्चाई ये नही होती, कई बार लगातार गलतियों को गिनाने से व्यक्ति त्रस्त हो जाता है और वे उस कार्य को करना ही छोङ देता है या इतना ज्यादा हतोत्साहित हो जाता है कि निराशा के आगोश में चला जाता है। वो सोचने लगता है कि हम तो जिंदगी में कुछ कर ही नही सकते। मनोवैज्ञानिक नजरिये से यदि सोचें तो, सच्चाई ये है कि जब हम किसी की गलतियों को फोकस करते हैं तो सिर्फ दूसरों के नजरिए से देखते हैं। हम ये नही सोचते कि यदि हमें हरपल नाकामी ही दिखाई जायेगी तो हमें कैसा लगेगा। अक्सर हम लोग पर उपदेश कुशल बहुतेरे की धारा में बहते जाते हैं। सामान्यतः लोग प्रशंसा और प्रोत्साहन के महत्व को नही समझते और बेवजह घर के सदस्यों की, समाज की और सरकार की गलतियों को ढूंढते रहते हैं। जिससे किसी का भी आत्मविश्वास डगमगा सकता है। आज हम सभी दूसरों की गलतियाँ निकालने में इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि, प्रोत्साहन और प्रशंसा के जादूई असर को नजरअंदाज़ कर देते हैं। 

दोस्तों, यदि हम किसी को आगे बढाना चाहते हैं तो उसके अच्छे कामो की प्रशंसा करें। उसे आगे बढाने के लिए प्रोत्साहित करें। नाकामियां तो उस रात की तरह है जिसे प्रोत्साहन रूपी प्रकाश से दूर किया जा सकता है। जब किसी की गलती को देखें तो उसको उसकी अच्छाई पहले बताएं फिर अपनेपन से उसकी गलतियों को समझाएं। जैसे कि, यदि एक बच्चा विज्ञान, अंग्रेजी या सामाजिक अध्ययन में क्लास में सबसे ज्यादा अंक ला रहा है। परंतु गणित और हिन्दी में उसे अपेक्षाकृत नम्बर नही मिल रहा हैं तो, उसकी कमियों पर फोकस न करते हुए उससे ये कह सकते हैं कि,  आप के पास बुद्धी है और आप मेहनत भी करते हो तभी तो बाकी विषयों में अच्छा कर रहे हो। आप थोङी ज्यादा मेहनत करोगे तो गणित में भी अच्छे अंक जरूर आयेंगे। उसे विश्वास दिलाएं कि उसका प्रयास सराहनिय है और लगातार प्रयास से सभी विषय में अच्छे अंक आयेंगे। यकिनन ऐसे हौसले से कल्पना के परे परिणाम आते हैं। विपरीत परिस्थिती में लोगों के कटाक्ष से व्यक्ति टूट जाता है लेकिन प्रोत्साहन मिले तो सफलता के रेर्काड तोङ देता है। प्रशंसा और प्रोत्साहन ऐसी जङी बूटियां हैं जो असफलताओं में भी आगे बढने की ऊर्जा देती हैं। वैसे भी सीखना तो नैवर एंडिंग प्रॉसेज है अर्थात कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया। प्रोत्साहन और प्रशंसा तो ऐसा अनमोल उपहार है, जो किसी को भी बिना खर्च के दिया जा सकता है और इससे निराशा के पल में उम्मीद के दिए जलाए जा सकते हैं। प्रोत्साहन और प्रशंसा तो सोने पे सुहागे की तरह है, जिसके मिलने से हम सभी सफलता के शिखर को छू सकते हैं। 

अतः मित्रों, प्रोत्साहन और प्रशंसा के भाव को शब्दो की अभिव्यक्ति दें क्योकि ये भाव एक मिठास की तरह है जो मन में मधुरता और कार्य में सकारात्मक गति प्रदान करते हैं। प्रोत्साहन और प्रशंसा की खुशबु को निश्छल मन से प्रसारित करें क्योंकि सफलता के रास्ते में ये अचूक औषधी है। 

स्वामी विवेकानंद जी ने प्रोत्साहित करते हुए कहा है, All Power is within you; You can do anything & everything. So...

Arise, awake & stop not till the goal is reached.

Monday, January 26, 2015

मेरा भारत महान



सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा, अनेकता में एकता के स्वर को आज भी गुंजायमान कर रहा है। एक सम्प्रभु एवं अखण्ड भारत की कल्पना देश की धरती पर युगों-युगों से जीवित है। गीता, रामायण,वेद एवं पुराण हमारी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता के आधार स्तम्भ हैं। ईद, दिवाली, होली, बैसाखी तो कहीं पोंगल, बिहु जैसे त्योहारों को समेटे हुए भारत देश महान है, जिस पर हम सबको नाज है। हमें अपने भारतीय होने पर गर्व है। आज भले ही आतंकवाद, जनसंख्या विस्फोट, जातिवाद तथा धार्मिक उन्माद बढ रहा है फिर भी हम सबको ये विश्वास है कि ये अंधकार हमारी संस्कृती के प्रकाश से बोझिल हो जाएगा। मुगलों की तबाही, अंग्रेजों की दासता तथा विदेशी ताकतों के अत्याचारों से भी हमारे हौसले टूटे नही हैं। हिमालय की तरह मजबूत फौलाद लिए भारत के हर बच्चे में आज भी सुभाष, आजाद, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी विद्यमान हैं। यहाँ हर बाला लक्ष्मीबाई है।  हमारी संस्कृति, सभ्यता, आध्यात्म तथा नैतिक बल एवं दयालु भावनाओं में, बुद्ध, महावीर तथा नानक मुस्कराते हुए मिल जाएंगे। सामाजिकता ने विवेकानंद, दयानंद तथा कबीर को अपने में समाहित कर लिया है।  गाँधी के राम राज्य की कल्पना आज भी साकार हो रही हैं। गॉव में बसता भारत अपनी समृद्धी और संस्कृति को आधुनिकता की आँधी में भी सुरक्षित रखे हुए है। जब-जब हमारी संस्कृति एवं धर्म पर कुठाराघात हुआ तब-तब किसी न किसी अवतार  ने देश की दिशा और दशा को सुरक्षा प्रदान की है। 21वीं शदी की आधुनिक तकनिक हो या ग्लोबलाइजेशन का ज़माना, हम भारतीय वसुधैव कुटुंबकम और अतिथी देवो भवः की विचारधारा के साथ स्वाभीमान से जीना जानते हैं। आज भी खादी के कपङों और गन्ने के रस का मुकाबला ब्रानंडेड बाजार नही कर सकते। आज हम भले बाहरी रूप में पश्चिमी बन जाएं परंतु हमारी आंतरिक शक्ति और मनोवृत्ति नितांत भारतीय है। चारों दिशाओं में तामसी प्रवृत्तियों का मायाजाल भयभीत कर रहा हो और अनेक समस्याएं अमरबेल की तरह बढ रहीं हों फिर भी उनका अंत निश्चित है क्योकि मन ये विश्वास है, हम होंगे कामयाब। भारतीय पुरातन संस्कृति पर हम सबको गर्व है। अनेक अंर्तविरोधों के बावजूद भारत की गंणतत्रं व्यवस्था आज भी निरंतर गतिमान है।  हमारा गंणतंत्र विश्व का सबसे बङा गंणतंत्र है। हमारा देश अनेक मुश्किलों के बावजूद  गौरव के शिखर पर पहुँचेगा। विश्व विजयी तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा का नारा सदैव बुलंद था और रहेगा क्योकि मेरा भारत महान है। 
                                                  

Thursday, January 22, 2015

कर्मवादी बने न की भाग्यवादी।


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचना।
मा कर्मफलहेतुभूर्मा ते संगोsस्त्वकमर्णि।।


विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ गीता में कर्म को सर्वोपरि माना गया है। गीता में कहा गया है कि कर्म करना मनुष्य का अधिकारिक कर्तव्य है। कर्म अर्थात सभी सजीव जगत द्वारा किया गया कार्य एवं जिसको करते वक्त किसी भी फल यानि की परिणाम की कामना नही करना चाहिए। परिस्थिती कैसी भी हो परिणाम कुछ भी हो, निष्काम भाव से अपने-अपने कर्तव्यों का यथाशक्ति पालन करना चाहिए। विधि का विधान भी यही कहता है कि, प्रत्येक प्राणीं को जिवन यापन हेतु कार्य करना अनिवार्य है।

परन्तु कई बार ये देखा जाता है कि हमारे समाज में पुरुषार्थवादी आदर्शों के स्थान पर भाग्यवादी विचारधारा की लहर इस प्रकार व्याप्त हो रही है कि, मनुष्य अपने कर्मों के प्रति उदासीन होकर भाग्य पर अधिक भरोसा करने लगा है। यत्र-तत्र लोग ये कहते हुए मिल जाते हैं कि, भाग्य में ही तकलीफ है तो मेहनत करने से क्या फायदा, जो कुछ होना है होकर रहेगा या सब विधि का विधान है.............इत्यादि। जो लोग ये कहते हैं कि किस्मत पहले लिखी जा चुकी है तो कोशिश करने से क्या फायदा, ऐसे लोगों को चाणक्य कहते हैंः- 

"तुम्हे क्या पता ! किस्मत में ही लिखा हो कि कोशिश करने से ही सफलता मिलेगी। पुरषार्थ से ही दरिद्रता का नाश होता है।"


हमारे समाज में कुछ भाग्यवादी विचारधारा के लोग अक्सर ये कहते हुए मिल जायेंगे कि, जितना भाग्य में लिखा है मिल ही जायेगा। ऐसे लोगों का मानना है, 
अजगर करे ना चाकरी, पंक्षी करे ना काम। दास मलुका कह गये सबके दाता राम।। जबकि  गीता में श्री कृष्ण ने सीधे एवं सरल तरीके से उपदेश दिया है कि, मनुष्य को किसी भी परिस्थिती में कुछ न कुछ तो कर्म करना ही होगा क्योंकि अर्कमण्यता में जीवन संभव नही है। जीवन, समाज और देश की रक्षा तथा उन्नति के लिए कर्म करना उसी तरह आवश्यक है, जैसे जिवन के लिए हवा और पानी।

मित्रों, मन में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि, जब सब कुछ भाग्य अनुसार है तो जरा सी तकलीफ में हम लोग डॉक्टर के पास क्यों जाते हैं? जब रोगी को कष्ट निष्चित है और मृत्यु भी निष्चित है, तो उपचार में पैसा समय और श्रम लगाने की क्या आवश्यकता है?? फिर भी हम डॉक्टर के पास जाते हैं, वास्तव में हम तकलीफ को बर्दाश्त नही कर सकते इसीलिए जब पुरुषार्थ की बात आती है तो  भाग्य की दुहाई देकर मेहनत करने से भी कतराते हैं। सच्चाई तो ये है कि भाग्य का दूसरा नाम ही करम है। रामायण में कहा गया है कि, कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करे यो तस फल चखा।। अर्थात हमारे द्वारा किये गये कार्यों से ही हमारे भाग्य का निर्माण होता है। 

हममें से कई लोग जन्म-जन्मांतर की बातें करते हैं। जन्म पिछला हो या उसके पूर्व का, सभी जन्मों का लेखा-जोखा हमारे कर्मों पर ही निर्भर होता है। भाग्य को कोसने में समय नष्ट करने की बजाय यदि हर व्यक्ति अपने-अपने कार्यों पर ध्यान दे और ईमानदारी से मेहनत करे तो सफलता अवश्य प्राप्त होती। एक विद्यार्थी का कर्म है अध्ययन वो जितनी शिद्दत और ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगा उसे सफलता अवश्य मिलेगी।  कई बार  मौसम का मिज़ाज किसान के अनुकूल नही रहता फिर भी किसान भगवान भरोसे या भाग्य भरोसे न रहते हुए अपने कर्म को पुरी निष्ठा से करता है। उसकी मेहनत से ही हम सबको जीवन हेतु अनाज प्राप्त हो पाता है। अक्सर भाग्यवाद हमें वस्तुस्थिति को समझने और उसका निराकरण करने की क्षमता से वंचित करता है। जिससे हमारा विचार कुंठित होता है और तर्क, विचार एवं कर्म में हमारी उदासीनता नजर आने लगती है, जो मानव प्रगति की सबसे बङी बाधक है। 

विनोबा भावे कहते हैं कि,  "कर्म वो आइना है, जो हमारा स्वरूप दिखा देता है। इसलिए हमें कर्म का एहसानमंद होना चाहिए।" 

हमारी दुनिया में कई ऐसे लोग हुए हैं जिनको कहा गया था कि इसके भाग्य में तो विद्या नही है, किन्तु उन लोगों ने अपने कर्मों के द्वारा अपनी किस्मत ही बदल दी। संस्कृत व्याकरण के महान विद्वान पाणिनी बचपन में अल्प बुद्धि के थे। एक सबक भी याद नही कर पाते थे। एक बार गुरू जी ने उन्हे कुछ याद करने को दिया परंतु वे उसे याद न कर सके तो गुस्से में गुरू जी ने पाणिनी को सजा देने के उद्धेश्य से हाँथ आगे बढाने को कहा। जैसे ही गुरू जी ने हाँथ देखा तो गुस्से को खत्म करते हुए बोले इसके भाग्य में तो विद्या ही नही है, इसे क्या सजा दूं!  तब पाणिनी ने अनुरोध किया कि गुरू जी विद्या की भाग्य रेखा कौन सी है। शिष्य के अनुरोध पर गुरू जी ने हाँथ में लकीर का स्थान बता दिया। पाणिनी ने तुरंत चाकू से उस स्थान पर विद्या की रेखा बना दी और अध्ययन में पुरी लगन से जुट गये। उन्होने अष्टाध्यायाई नामक पुस्तक की रचना की, जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहसत्र सूत्र हैं। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनी का अतुलनिय योगदान है। ये कहना अतिश्योक्ति नही होगी कि, अपने कर्मों के अथक प्रयास से ही पाणिनी जी ने अपना भाग्य स्वयं लिखा। 

गुरू नानक देव कहते हैं कि,  "कर्म भूमी पर फल के लिए श्रम सबको करना पङता है, रब तो सिर्फ लकीरें देता है उसमें रंग तो हम सबको भरना पङता है।"

हमें व्यर्थ की शंकाओं और आशंकाओं के मायाजाल से निकल कर उत्साह के साथ आशावादी और कर्मवादी बनना चाहिये। विवेकानंद जी भी कर्म को श्रेष्ठ बताते हैं। कहा जाता है कि, ईश्वर भी उसी की मदद करते हैं जो स्वयं कार्य करने का प्रयास करता हैं। अपने भाग्य के निर्माता हम स्वंय हैं। भाग्य तो पुरुषार्थ की छाया है, जो कर्मवादी के साथ उसके अनुचर की तरह चलता है। ईमानदारी और लगन से किये गये काम में सफलता अवश्य मिलती है। यही विश्वास और निष्ठा मनुष्य की नियति ( भाग्य ) को बदल देते हैं। अतः मित्रों, हमसब कर्मवादी बने न कि भाग्यवादी। 

ए.पी.जे. अब्दुल्ल कलाम के विचार से, 
If you salute your duty, You no need to salute Anybody,
But If you pollute your duty, You have to Salute to Everybody. 

अर्थात, यदि आप अपने कर्म को सलाम कर रहे हैं तो, कोई जरूरत नहीं पङेगी किसी को सलाम करने की किन्तु यदि आप अपने कर्म के प्रति उदासीन हैं तो आपको हर किसी को सलाम करना पङेगा। 

Monday, January 12, 2015

ब्रेक तो बनता है


आज की भागम भाग जिंदगी में, अपने सपने पुरे करने में हम कहीं खो गये हैं। हम सभी अपनी – अपनी जिमेदारियों में व्यस्त हैं। सबकी पसंद नापसंद का ख्याल रखते हुए अक्सर खुद को भूल जाते हैं। सब कुछ फिट रखने के चक्कर में  खुद को सबसे ज्यादा अनफिट रखते हैं। रूटीन लाइफ जीते – जीते चाहे वो कितनी ही अच्छी क्यों न हो एकरसता आ ही जाती है। जिसका असर जिंदगी पर पङता है। झुझलाहट, चिङचिङापन, बात – बात पर गुस्सा आना कब हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं, हमें पता ही नही चलता। दरअसल रूटीन को ब्रेक करना जरूरी है। अगर हम प्रकृति को देखें तो वो हमें कितनी खूबसूरती से संदेश देती है। कोई भी मौसम स्थाई होकर नही आता। हम हैं कि एक ही तरह से जिये जाते हैं। मानते हैं दोस्तों पढ़ना जरूरी है ऑफिस  जाना  जरूरी है, घर के काम भी जरूरी हैं। पर हफ्ते में एक दिन तो देर तक सोया जा सकता है, दोस्तों के साथ अपने बचपन को याद करके क्रिक्रेट या फुटबॉल तो खेला जा सकता है। Routine Break तो बनता है। क्यूं न हम कुछ पलों के लिय के वो करें जो हमें सबसे ज्यादा अच्छा लगता था लेकिन किन्ही कारणों से नही कर पाये जैसे—Dancing, Swimming, Singing, Painting Etc. हफ्ते में एक बार कुछ अपने मन का करके देखिये यकीन मानो मित्रों आप आगे के लिये अधिक ऊर्जावान (Energetic) महसूस करेंगे। एक कहानी सुनाते हैं—एक बार एक ठेकेदार कुछ लकङहारों को जंगल में लकङी काटने के लिये ले गया। उसने लकङहारों से कहा कि तीन दिन में जो सबसे ज्यादा लकङी काटेगा उसे सबसे ज्यादा पैसा मिलेगा एवं एक बाइक भी ईनाम में मिलेगी। फिर क्या सारे लकङहारे लकङी काटने में जुट गये। उनमें सोहन नाम का एक लकङहारा लकङी काटने के बीच मे कुछ ब्रेक लेता इसको देख बाकी लकङहारे हँसते किन्तु सोहन अपने हिसाब से काम करता। तीन दिन पूरे हो जाने पर ठेकेदार ने देखा सोहन ने सबसे ज्यादा लकङी काटी। ऐसा कैसे हो गया ? उसने तो लगातार काम भी नही किया था। मित्रों, सोहन आराम के समय अपनी कुल्हाङी पर धार किया करता था जिससे वो अधिक लकङी काट सका। बाकी लकङहारों की कुल्हाङी में लगातार काम करने से धार कम हो गई थी।

दोस्तों हमें भी अपने अंदर की ऊर्जा (energy) को  बीच-बीच में Recharge करना चाहिये तभी हम बेहतर performance दे सकेगें। जब हम खुश रहेंगे तभी अपनो को भी खुश रख सकेंगे।

आइनसटाइन जब कभी प्रयोग में असफल हो जाते या अन्य किसी कारण से तनावग्रस्त होते उसी समय वायलन बजाने बैठ जाते। वायलन बजाने में इतने मगन हो जाते कि सारे तनाव भूल जाते। उसके बाद नई ऊर्जा से नऐ प्रयोग में जुट जाते। मित्रों संगीत में बङी ताकत होती है। संगीत मृतप्राय व्यक्तियों में प्रांण फूंक सकता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार रेडियो सुनने से लोगों का खुशी का स्तर 100 प्रतिशत और एनर्जी लेवल 300 प्रतिशत रहता है। Energetic  होने के लिये रूटीन ब्रेक तो बनता है।

माध्यम कोई हो किसी को outing पसंद है तो किसी को फिल्म देखना। मेरी पंसद है देर तक सोना और माँ से बातें करना   मित्रों, वक्त की शाख से टूट रहे लम्हों को  समेंट ले, ताकी मुस्कुरा उठे जिंदगी, याद करें बचपन को और कॉलेज के मस्ती भरे लम्हों को। अपने अंदर के बच्चे को वापस जिंदा करें जो जिम्मेदारियों में कब बङा हो गया पता ही न चला। Friends बचकाना सा ब्रेक तो बनता है।