Wednesday, September 10, 2014

विवाह जैसे पवित्र बंधन पर तलाक का ग्रहणं क्यों???

हिन्दु धर्म में प्रचलित सोलह संस्कारों में से एक संस्कार है विवाह, जिसके गठबंधन से दो लोगों यानि की वर एवं वधु ही नही बल्की दो परिवारों, दो संस्कारों का भी मिलन होता है। मानव समाज की महत्वपूर्ण प्रथा विवाह के अंर्तगत वर एवं वधु अग्नि को साक्षी मान कर तन, मन और आत्मा के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हमारे पुराणों, वेदो एवं साहित्यों में भी विवाह की मर्यादा को स्थापित किया गया है।समाज में  हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाने वाला वैवाहिक बंधन का कार्यक्रम दो दशक पहले तक 10 - 12 दिन तक चलता था। समय के साथ 5 दिन का हो गया फिर तीन दिन में ही विवाह कार्यक्रम संपन्न होने लगे। आज आलम ये है कि समाज का अति महत्वपूर्ण संस्कार महज तीन घंटे में संपन्न हो जाता है। समय की कमी का रोना रोने वालों के लिए वो दिन दूर नही जब विवाह जैसा पवित्र बंधन "रेडी टू ईट" की तरह दो मिनट में ही पूर्ण हो जायेगा। 

कहते हैं "सोना तप कर ही कुन्दन बनता है" उसी प्रकार वैवाहिक बंधन भी अपनी-अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार हवन की वेदी पर अग्नि के समक्ष किये गये वादों से मजबूत होता है। समय के परिवर्तन ने और आधुनिकता की आँधी से इस पवित्र संस्कार में बदलाव की बयार बह रही है। जहाँ गोत्र, जाति, धर्म एवं गुण आदि का कठोरता से पालन होता था वहाँ अब लङके लङकियों की राय और पसंद को महत्व दिया जा रहा है। पूराने जमाने की मान्यताओं, उपजाति, योग्य वर, सुशील दुल्हन जैसी कसौटियों से हट कर पालक की सहमति से अंर्तजातिय विवाह को सहमति मिल रही है। जाति तो अब केवल राजनैतिक उपकरण रह गई है।  

शादी को लेकर अब लचीला और व्यवहारिक रवैया अपनाया जा रहा है। वैचारिक सामजस्य पर अधिक जोर दिया जा रहा है। वर-वधु की तलाश पंडितों या रिश्तेदारों की बजाय वैवाहिक विज्ञापनो तथा इंटरनेट के माध्यम से की जा रही है। मन में प्रश्न ये उठना स्वाभाविक है कि आज अधिक लचिलापन, वैचारिक महत्व और उच्च शिक्षा के बावजूद वैवाहिक बंधन तलाक जैसी कुप्रथा की अग्नि में पहले से ज्यादा क्यों सुलग रहे हैं?

विज्ञान की नित नई टेक्नोल़ॉजी जहाँ विकास के नये आयाम खोल रही है वहीं, वैचारिक सामजस्य के बावजूद विवाह जैसे पवित्र बंधन को विच्छेद भी कर रही है। एक सर्वे के अनुसार विगत एक साल में तलाक का कारण आधुनिक परिवेश में व्याप्त फेसबुक और वाट्सअप जैसी सुवधाएं भी हैं। कई बार नेटवर्क प्रॉब्लम की वजह से कुछ ऐसी गलतफहमी हो जाती है कि बात तलाक तक पहुँच जाती है। वास्तव में हम सभी आज आधुनिकता के रंग में इस कदर रंग गये हैं कि एक दूसरे की बातों को धैर्य से सुनने की शक्ति को कहीं खोते जा रहे हैं। एक तरफ तो हमारी नई टेक्नोल़ॉजी और दूसरी तरफ सामाजिक दुषित मान्यता रिश्तों को तोङने में "आग में घी" का काम करती हैं। 

आज हम कितने भी आधुनिक होने का परचम फैलाएं किन्तु अभी भी सिर्फ लङकियों को ही अच्छी पत्नी एवं अच्छी बहु बनने की नसीहत दी जाती है। कोई भी अभिभावक अपने बेटे को एक अच्छा पति एवं अच्छा दामाद बनने की नसिहत क्यों नही देते?  21वीं शदी में लङका और लङकी की बराबरी की बात करते हैं। हिन्दु अधिनियम 955 के तहत दोनों को बराबरी का दर्जा देते हैं। वेदों के अनुसार भी पत्नि को आधा अंश कहते हैं। "ताली तो दोनो हाँथ से ही बजती है" फिर सिर्फ एक को नसिहत देने से विवाह जैसे पवित्र बंधन को कब तक टूटने से बचाया जा सकता है। 


कुछ लङके प्यार  को समझते हुए भावनात्मक भावनाओं से युक्त यदि अपनी पत्नी की काबलियत का आदर करते हैं और उनकी कही बात को  अहमियत देते हैं तो, हमारे अपने कहे जाने वाले रिश्ते ही इस भावना को "जोरू का गुलाम" जैसी उपाधी दे देते हैं। कई बार ऐसे आघातों से दामपत्य जैसा मधुर रिश्ता धाराशायी हो जाता है। 

विवाह संबन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए काउनसलर (सलाहाकारों) की बढती बयार यही दर्शाती है कि हमारे समाज में आज हम भले ही अधिक शिक्षित हो गये हों, अधिक आर्थिक संपन्न हो गये हों परन्तु भावनात्मक रिश्तों को आपस में सुलझाने में असर्मथ हैं। ये सलाहकार मनोवैज्ञानिक दृष्टीकोंण से समझा जरूर सकते हैं किन्तु रिश्ते सदैव मधुर रहें इसकी गारंटी नही देते। अतः वैवाहिक युगल को अपनी समस्याओं को आपसी बातचीत और धैर्य के साथ स्वविवेक से हल करना चाहिए, जिससे आधुनिकता के परिवेश में भी  हम अपनी संस्कृति जो की भावनात्मक रिश्तों की नींव है, उससे दूर न हों सकें। 

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, विवाह जैसे पवित्र संस्कार को जिस पर सृष्टी  को आगे बढाने का दायित्व भी है ऐसे पवित्र बंधन को अपने प्यार, समर्पण और आपसी समझदारी से इतना मजबूत करना चाहिये कि आधुनिकता और सामाजिक दुषित सोच  इस बंधन को तोङ न सकें। 

Marrige is a thousand little things.... 
It's giving up your right to be right in the heat of an argument. It's forgiving another when the let you down . It's loving someone enough to step down so they can shine. It's frindship. It's being a cheerleader and trusted confidant. It's place of forgiveness that welcomes one home and arms they can run to in the mist of a storm. 
It's grace.

Tuesday, September 9, 2014

उत्तराखण्ड के पाँच प्रयाग

उत्तराखण्ड के पाँच प्रयाग



भारत वर्ष में पवित्र नदियों के संगम को प्रयाग कहा जाता है। इलाहाबाद में गंगा, जमुना एवं सरस्वती के संगम को प्रयाग राज कहा जाता है। ऐसे ही उत्तराखण्ड के पाँच प्रयागों का हमारे धर्मों में विषेश महत्व है। जो इस प्रकार हैः-


देवप्रयागः- अलकनंदा तथा भगीरथ नदियों के संगम पर देवप्रयाग नामक स्थान स्थित है। इसी संगम स्थल के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है । यह समुद्र सतह से १५०० फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। देवप्रयाग में शिव मंदिर तथा रघुनाथ मंदिर हैजो की यहां के मुख्य आकर्षण हैं। रघुनाथ मंदिर द्रविड शैली से निर्मित है। देवप्रयाग को सुदर्शन क्षेत्र भी कहा जाता है। देवप्रयाग में कौवे दिखायी नहीं देतेजो की एक आश्चर्य की बात है।



रुद्र प्रयागः- रुद्र प्रयाग मंदाकिनी और अलकनंदा के संगम पर स्थित है। अलकनंदा का उद्गम स्थल बद्रीनाथ धाम है एवं मंदाकिनी शिव के क्षेत्र केदारनाथ से प्रवाहित होती है। रुद्र प्रयाग में ही नारद जी ने रुद्र रूप शिव से संगीत का ज्ञान प्राप्त किया था। यहाँ शिव के रुद्र अवतार का दर्शन होता है। यहीं पर भगवान रुद्र ने श्री नारदजी को `महतीनाम की वीणा भी प्रदान की थी। यहीं से केदारनाथ के दर्शन हेतु यात्रा मार्ग आरंभ होता है।

कर्ण प्रयागः-  कर्ण प्रयाग में अलकनंदा तथा पिंडर नदी का संगम स्थल है। पिण्डर का एक नाम कर्ण गंगा भी हैजिसके कारण ही इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग पडा। यहीं पर महादानी कर्ण द्वारा भगवान सूर्य की आराधना और अभेद्य कवच कुंडलों का प्राप्त किया जाना प्रसिद्ध है। कर्ण की तपस्थली होने के कारण भी इस स्थान को कर्णप्रयाग कहा जाता है।

नंद प्रयागः- नंदाकिनी एवं अलकनंदा के संगम को नंद प्रयाग कहते हैं। कर्णप्रयाग से उत्तर में बदरीनाथ मार्ग पर 21 किमी आगे नंदाकिनी एवं अलकनंदा का पावन संगम है। पौराणिक कथा के अनुसार यहां पर नंद महाराज ने भगवान नारायण की प्रसन्नता और उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए तप किया था। यहां पर नंदादेवी का भी बड़ा सुंदर मन्दिर है। नन्दा का मंदिरनंद की तपस्थली एवं नंदाकिनी का संगम आदि योगों से इस स्थान का नाम नंदप्रयाग पड़ा। संगम पर भगवान शंकर का दिव्य मंदिर है। यहां पर लक्ष्मीनारायण और गोपालजी के मंदिर दर्शनीय हैं। यह सागर तल से २८०५ फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है।है।

विष्णु पुराणः- विष्णु पुराण धौली गंगा तथा अलकनंदा का संगम स्थल है। यहाँ विष्णु जी की प्रतिमा से सुशोभित मंदिर और विष्णुकुण्ड दर्शनिय है। यहीं से सूक्ष्म बदरिकाश्रम प्रारंभ होता है। इसी स्थल पर दायें-बायें दो पर्वत हैंजिन्हें भगवान के द्वारपालों के रूप में जाना जाता है। दायें जय और बायें विजय हैं। स्कंद पुराण में इसका वर्णन वर्णित है।


भारत की संस्कृति में नदियों को देवी रूप प्रदान किया गया है, अतः उपरोक्त प्रयागों का दर्शन धार्मिक यात्रा में विशेष महत्व रखता है। इन पाँच प्रयागों के पश्चात ही देव प्रयाग के बाद से ही इस धरती पर माँ गंगा का अवतरण होता है। ऋषिकेश से अलकनंदा मंदाकिनी नंदाकिनी धौली गंगा पिंडर नदी तथा भागीरथी माँ गंगा के नाम से इस धरती पर पूज्यनिय हैं। पवित्र पावनी जीवनदायनी मोक्षदायनि माँ गंगा को निमर्ल एवं स्वच्छ रखने का प्रण करते हुए शत् शत् नमन करते हैं।

आधुनिक परिपेक्ष में पित्रों की स्मृति


अपने पूर्वजों के प्रति स्नेह, विनम्रता, आदर व श्रद्धा भाव से किया जाने वाला कर्म ही श्राद्ध है। यह पितृ ऋण से मुक्ति पाने का सरल उपाय भी है। इसे पितृयज्ञ भी कहा गया है। हर साल भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक श्राद्ध पर्व का आयेजन चलता है।

ब्रह्मपुराण के अनुसार श्राद्ध पक्ष में ब्राह्म्ण भोजन के अलावा दान का भी बड़ा भारी महत्व है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पित्रों के निमित्त किये गये दान का उत्तम फल प्राप्त होता है।  

पित्रों के सम्मान में आज के परिपेक्ष में थोङा परिवर्तन नजर आता है, जैसे- आज कल श्राध्द पक्ष के दौरान अनाथ आश्रमों में भोजन कराने का चलन तेजी से बढा है। ये बहुत अच्छी बात है, कम से कम सम्पन्न ब्राह्म्णों को तो भोजन कराने से लाख गुना अच्छा है। किन्तु कभी हम सबने ये सोचा कि पुण्य के इस शुभ कार्य में जाने-अनजाने हम बच्चो में कैसी मानसिकता का विकास कर रहे हैं? किसी की पुण्य तीथि उनके लिये किसी उत्सव से कम नही होती क्योंकि उनको अच्छे-अच्छे पकवान खाने को मिलते हैं। पूरे 15 दिन किसी उत्सव से कम नजर नही आते।

दिवस तो सिर्फ 15 होते हैं, पुण्य तिथियाँ अनगिनत, आलम ये होता है कि सुबह के नाश्ते से लेकर रात्री भोजन तक पकवानों की बाँढ सी आ जाती है। ये सिलसिला श्राद्ध पक्ष की शुरुवात से अंत तक ऐसे ही चलता है। विचार करने योग्य बात ये है कि लगातार 15 दिनों तक गरिष्ठ भोजन क्या स्वास्थ की दृष्टी से अनुकूल है, क्या हम अपने बच्चों को भी ऐसे ही लगातार गरिष्ठ भोजन देते हैं?

हम कई आश्रमों के बच्चों से मिले हैं। जो बच्चे छोटे हैं, नासमझ हैं, वो तो ऐसी परंपरा से बहुत खुश होते हैं क्योंकि उन्हे रोज पकवान खाने को मिलता है। उनको इससे कोई मतलब नही कि उनके स्वास्थ पर क्या असर होगा, किन्तु जो समझदार हैं, बङे हैं, वो ऐसा खाना रोज खाने से भूखे रहना ज्यादा पसंद करते हैं। हम सब अपने पूर्वजों को खुश करने के लिये ये कार्य करते हैं। ये सब देखकर क्या हमारे पूर्वज खुश होते होंगे ?

वर्ष में 365 दिन होते हैं किन्तु हम मे से कई लोगों को पित्रपक्ष के किसी एक दिन ही ये बच्चे याद आते हैं, बाकी दिन उनको भोजन मिला या नही ये तो हम देखने ही नही जाते, क्योंकि हमारी प्राथमिकता तो पित्रपक्ष में अपने पित्रों को खुश करना है वो भी इसलिये, कि मान्यता अनुसार श्राद्ध करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्त हो सुख प्राप्त करता है एवं अंत में परम गति को प्राप्त होता है।

मित्रों यदि हम वास्तव में अपने पित्रों को याद करते हैं एवं उनका आर्शिवाद हमेशा चाहते हैं, तो हमें अपनी सोच एवं रूढीवादी विचारों को थोङा बदलना होगा। मित्रों, यदि हम पित्रों की पुण्य  तीथि के दिन भोजन पर व्यय होने वाली राशी को संकल्प करके रख ले एवं इसी राशी से वर्ष के किसी रविवार को जाकर उन्हे भोजन करा सकते हैं। हममें से किसी एक की शुरुवात एक और एक ग्यारह हो सकती है और ऐसा करने से उन बच्चों को प्रत्येक रविवार को अलग हट के भोजन करने का अवसर मिलेगा जो स्वास्थ की दृष्टी से भी अनुकूल होगा। कहते शिक्षा दान भी बहुत बङा दान है, पित्रों की खुशी के लिये जरूरत मंद बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करके भी उन्हे आत्मर्निभर बना सकते हैं।

हम अपने पित्रों की याद एवं उनके नाम को हमेशा स्मरणीय भी बना सकते हैं। किसी 18वर्ष से ऊपर के अनाथ बच्चे को अपनी दुकान एवं कारखाने में नौकरी देकर उसे जीवन भर के लिये रोजी-रोटी दे सकते हैं। इससे उस बच्चे में आत्म सम्मान से जीवन जीने की मानसिकता का विकास होगा जो समाज और देश के लिये हितकारी होगा। आज कई लोग पूर्वजों के नाम से प्याऊ लगवाकर, मुफ्त स्वास्थ लाभ दे कर या शिक्षा के क्षेत्र में छात्रवृत्ती की व्यवस्था करके मेघावी जरूरत मंद बच्चों को आत्मर्निभर बनाने के लिये सार्थक प्रयास कर रहे हैं। 

मित्रों, श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों को ज्यादातर भोजन करा कर ही याद करने का चलन अधिक दिखता है, मन में प्रश्न उठता है कि क्या हमारे पूर्वजों को सिर्फ भोजन की ही आवश्यकता होती है?, क्या अन्य मूलभूत आवश्यक्ताओं की पूर्ती परलोक में ईश्वर के द्वारा हो जाती है?

कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि जैसे ही हमारे बङे बूजुर्ग परलोक सिधारते हैं, उनकी सम्पत्ती को लेकर परिजनो में झगङा शुरू हो जाता है। सोचिये ऐसी स्थिती देख कर हमारे पूर्वज क्या खुश हो सकते हैं?  क्या हमारे पूर्वज ये नही चाहते कि उनके बच्चे आपस में मिल जुल कर रहें ? जिन रिश्तों से वे हमें जोङ के जाते हैं, हम उसे तो अपनेपन एवं ईमानदारी से निभा नही सकते, फिर ये भोजन कराना सिर्फ औपचारिकता ही कही जा सकती है। कहीं तो पिता के परलोक चले जाने पर उनकी जीवन संगनि, अर्थात अपनी माँ की देख भाल ही ठीक से नही करते किन्तु पिता की पुण्य तिथी पर ब्राह्म्ण को भोजन कराना नही भूलते। ये किस परंपरा का निर्वाह करके हम खुश होते हैं?

मित्रों, आज का युवा वर्ग बहुत ही समझदार है और तथ्यों के आधार पर आगे बढ रहा है। इसलिये हमें भी अपने विचारों और रुढीवादिता को तथ्यों की कसौटी पर देखना बहुत जरूरी है, वरना कहीं ऐसा न हो कि हमारी आने वाली पीढी ये समझ ले कि हमारे पूर्वज तो केवल भोजन की ही कामना रखते हैं।

हमारे पूर्वजों का सम्मान बना रहे एवं उनका आर्शिवाद हम सब पर रहे, इसी कामना के साथ एवं इस वादे से कि जिन रिश्तो से वो हमें जोङकर गये हैं, हम उन्हे प्यार और अपनेपन के साथ और मजबूत करेंगे। इसी भावांजली के साथ पूर्वजों को शत् शत् नमन है।

मैं जब भटकुँ तो सही राह दिखा देना। मेरे सर पर अपना हाँथ रख, अपने होने का एहसास करा देना।

ऊँ शान्ती

Monday, September 1, 2014

वृद्धावस्था अभिशाप नही है।



समय का चक्र अबाध गति से चलता रहता है। नियति का यही स्वाभाव है। आज जो बालक है वह कल युवा तो परसों वृद्ध होगा। यह निर्विवाद सत्य है कि वृद्धावस्था में इंसान कमजोर हो जाता है किन्तु उसका ये अर्थ कदापी नही है, कि वह बेकार हो गया। वृद्ध हमारे समाज का वटवृक्ष होते हैं, जो ताउम्र हमें हर मुसीबत से बचाते हैं।

इंसान की स्वयं की सोच उसे बूढा बनाती है। भारत में लोगों की मानसिकता है कि वे 40 वर्ष के बाद बुढे हो जाते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद तो आलम ये होता है कि वे कहने लगते हैं भाई! हम तो अब आराम करेंगे हम बुढे हो चुके। वास्तव में यही सोच इंसान को बूढा बनाती है।

वृद्धास्था अभिशाप नही है वरन् हमारे देश में वृद्धावस्था अभिशाप  पर्याय बन गई है। बदलते नैतिक मुल्यों एवं सामाजिक विघटन ने वृद्वस्था को असहनिय बना दिया है। आज की आधुनिकता से परिपूर्ण दिनचर्या में उनके लिए किसी के पास समय नही है जिससे वे अपने को उपेक्षित महसूस करते हैं। वृद्धावस्था सहज अवस्था है, और इससे सभी को गुजरना पङता है। जीवन की इस अवस्था को मनु तथा वेदव्यास की तरह सास्वत बनाना है।

21वीं शदी में वृद्धजनों को अपनी सोच में बदलाव लाना अनिवार्य है। यदि वे अपनी मजबूत सोच और संयमित, अनुशासित दिनचर्या को बनाये रखेंगे तो सदैव आत्मनिर्भर रहते हुए आने वाली पीढी को सकारात्मक संदेश देंगे। उनका जीवन भी सम्मान पूर्ण बना रहेगा। पश्चिमी सभ्यता के वायरस से ग्रसित आज की युवा पीढी को भारतीय संस्कृति का पाठ पढाने की अहम जिम्मेदारी हमारे बुर्जगों पर ही है। अपने अनुभवों और धैर्य के साथ वे दिशा भ्रमित नव यूवकों की दशा एवं दिशा बदल सकते हैं। 
किसी ने सच ही कहा है किः-  
A young man is a theory; an old man is a fact .

वृद्धावस्था आ गई है इसलिए परिश्रम करना बंद कर देना चाहिए, यह मान्यता गलत है। गतिशीलता का नाम ही जीवन है। बुढापा तो ऐसी अवस्था है, जिसमें एकांत साधाना का सुअवसर मिलता है। शारीरिक परिश्रम करना ही केवल काम नही होता बल्कि अपनी रचनात्मक उपलब्धियों से स्वयं के साथ अनेक लोगों का सहारा बना जा सकता है। ए.पी.जे. अब्दुल्ल कलाम आज भी अपने ज्ञान से युवाओं का मार्ग प्रश्सस्त कर रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है अपनी सोच को हमेशा श्रमशील बनाए रखना चाहिए। संसार में अनेक ऐसे लोग हुए हैं जिन्होने महत्वपूर्ण कार्य वृद्धावस्था में किए और ऐसी सफलता प्राप्त की जो शारीरिक शक्ति से संपन्न युवा भी नही कर पाते।
जर्मनी के राष्ट्रनिर्माता प्रिंस बिस्मार्क 80 वर्ष की उम्र में भी युवकों के समान कार्य करते थे। गाँधी जी की चाल से चाल मिलाकर चलने में युवा भी पीछे रह जाते थे। देश की आजादी में उनकी उम्र कभी भी बाधा नही बनी। देश हित के लिए 77 वर्षिय अन्नाहजारे आज भी पूरे जोश से अनशन पर बैठने का  दम रखते हैं।

गैलिलीयो 70 वर्ष के थे जब उन्होने गति के नियम की रचना पूरी की। प्लेटो का दर्शनशास्त्र 81 वर्ष की आयु में परिमर्जित हुआ। भारत की डॉ. लक्ष्मी सहगल जिन्होने सुभाषचन्द्र बोस के साथ भारत की आजादी में अपना महत्वपूर्ण सहयोग दिया था। वे 92 वर्ष की उम्र में भी सामाजिक कार्यों से जुङी रहीं और अंत समय तक डॉक्टरी सेवा के माध्यम से निरंतर क्रियाशील रहीं।

आज निदरलैंड, स्विडन, चौकोस्लोवाकिया जैसे कई देशों में वृद्धावस्था को उत्साह मय बनाने हेतु मैराथन जैसी अनेक खेल प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही है। वृद्धों को प्रोत्साहित करने एवं ऐसी प्रतियोगिताएं रखने में जर्मनी के डॉ. वान आकेन का पूर्ण सहयोग है। उनकी मान्यता है कि प्रतिदिन 20 से 30 किलोमीटर दौङने में उम्र कोई रुकावट नही होती। दौङने की गति धीरे-धीरे बढाने से मोटापा तो भागता ही है, साथ में रुधिर तंत्र के विकार भी नष्ट हो जाते हैं।

"Age is an issue of mind over matter.
If you don’t mind, it doesn’t matter."

ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि, अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करके इंसान अपने को वृद्धावस्था के अभिशाप से मुक्त कर सकता है।

फिल्मी पोस्टर






भारतिय सिनेमा अपने सौ वर्षों के सफर का जलसा मना रहा है। सौ वर्षों के सफर में कई नई चीजें जुङी तो कई पुराने तरीके आधुनिक तकनिकों के शिकार भी हुए। डिजीटल युग ने तो हाथ से बने  फिल्मी पोस्टर्स को गुजरे जमाने का अक्स बना दिया। पोस्टर बनाना श्रम-साध्य काम होता था। जिसके एवज में बनाने वाले को मेहनताना मिलता था, जो रचनात्मक कला से पूर्ण रोजगार होता था। किसी भी चेहरे को उसके मूल रूप में कागज पर उकेरना आसान नही होता था। बॉलीवुड में कई नामचीन लोगों ने इस विधा में काम किया, जो समय के परिर्वतन के साथ गुमनामी में खो गये। परन्तु चित्रकार एफ.एम. हुसैन तथा डी.आर.भोसले का नाम आज भी आदर से लिया जाता है। उनकी कार्यशैली एक अलग अंदाज में थी।

1924 में भारत में  पहली बार 'कल्याण खजिना' फिल्म का पोस्टर बना था। ये फिल्म शिवाजी के जीवन पर बनाई गई थी।  इसके पोर्स्टस बाबुराव पेंटर ने बनाए थे। संसार का पहला फिल्मी पोस्टर 1890 में एक लघु फिल्म प्रोजेक्शन 'आर्टटिकुएस' के लिए फ्रेंच चित्रकार जुल्स चेरेट ने बनाया था। 1913 में भारत की निर्मित पहली फिल्म का पोस्टर तस्वीर विहीन था। उस समय पोस्टर कैनवस पर हांथ से पेंट किये जाते थे। फिल्मो के प्रचार प्रसार में फिल्मी पोस्टर्स का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

1930 से लेकर 1960 के फिल्मी पोस्टर्स काफी चर्चा में रहे। संसार में लुप्त होती इस कला के कुछ पारखियों ने 2007 में  फिल्मी पोस्टर्स पर लगी प्रदर्शनी को सफल बनाया। इस प्रर्दशनी में  डी.आर.भोसले द्वारा बनाया गया गाइड का पोस्टर दो हजार डॉलर में बिका।  हॉलीवुड में कुछ समय पूर्व 'द साइलेन्स एंड द लैम्ब' फिल्म के पोस्टर को 35 साल का सबसे शानदार फिल्मी पोस्टर माना गया है।

आज नई पीढी अपनी इस लुप्त हेती सांस्कृतिक धरोहर को लेकर सजग है। हितेश जेठवानी जैसे कुछ लोग हस्तनिर्मित पोस्टर्स को हिप्पी डॉट संस्था के जरिये बढावा दे रहे हैं। ओसियन संग्रहालय में सदियों पुराने लगभग 19,500 पोस्टर्स सुरक्षित रखे गये हैं.। पश्चिमी देशों में बसे कला प्रेमियों के लिए भारतीय फिल्मी पोस्टर्स का विशेष महत्व है। एक दुकानदार द्वारा पाँच रूपये में खरीदे 'मदर इण्डिया' के एक पोस्टर को विदेश में लगभग 6 हजार में बेचा गया था।  फिरभी लगातार लुप्त होती प्रजातियोॆ की तरह ही फिल्मी पोस्टर्स का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है क्योंकि पोस्टर्स का सिधा रिश्ता प्रचार और एडवरटाइजिंग से होता है।
यदि सरकार और फिल्मी क्षेत्र के जागरूक लोग इन पोस्टर्स को सहजने का बीङा उठाएं तो निःसंदेह लुप्त होते पोस्टर्स फिर से जिवित हो जायेंगे और हजारो कलाकारों के हाथ को रोजी-रोटी का आधार मिल जायेगा।