Thursday, June 26, 2014

केदारनाथ धाम

केदारनाथ धाम

हिमालय की गोद में तपस्वियों, ऋषियों की तपो भूमि केदारनाथ शिव धाम समुन्द्र तल से 11735 फिट की ऊँचाई पर स्थित अत्यन्त शोभायमान स्थान है। यहाँ परम् पिता महादेव का ग्यारहवाँ ज्योर्तिलिंग श्री केदारेश्वर के रूप में विद्यमान है। पौराणिक कथानुसार केदारनाथ से संबंधी प्रचलित कथा इस प्रकार हैः-

कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद गोत्र हत्या के पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए पांडव काशी गये परन्तु वहाँ वे भोले भंडारी विश्वनाथ का दर्शन कर प्रायश्चित्त नहीं कर सके। ऐसा मानना है कि शिव शंकर उन्हे दर्शन देना नहीं चाहते थे, अतः वे हिमालय पर चले गये। पांडव महादेव को ढूढंते हुए हिमालय पहुँचे किन्तु शिव वहाँ से भी अदृश्य हो गये। इस स्थान को गुप्त काशी कहा जाता है। पांडव गौरी कुण्ड आदि स्थानों पर शिव को ढूंढते हुए आगे बढ रहे थे कि तभी नकुल और सहदेव को एक नर भैंसा दिखा जिसका रूप विचित्र था। विचित्र भैंसे को देखकर भीम उसके पीछे दौङे अत्य़धिक भागम-भाग के कारण भीम थक गये परंतु भैंसा भीम के हाँथ नहीं लगा। तभी भैंसे को दूर खङे देख भीम ने उसपर गदा से प्रहार किया तब भी वो भैंसा जमीन में मुख छिपाए बैठा रहा। भीम ने उसकी पूंछ पकङ कर जोर से खींचा तो भैंसे का मुख नेपाल में प्रकट हुआ जिसे पशुपतीनाथ के नाम से जाना जाता है। भैंसे का पार्श्वभाग वहीं रह गया, उसमें से दिव्य ज्योति प्रकट हुई। इस ज्योति में भगवान शिव शंकर प्रकट हुए और उन्होने पांडवों को दर्शन दिये। महादेव के आशिर्वाद से पांडव गोत्र हत्या के पाप से मुक्त हुए। पांडवों की प्रार्थना पर भगवान भोले नाथ त्रीकोंणिय आकार में भक्तों के कल्यांण हेतु वहीं विराजमान हो गये। नर भैंसे का पश्च भाग त्रीकोंणी था अतः शिव का ये रूप त्रीकोंणिय आकार में पूज्यनिय है।
नर भैंसे के रूप में प्रत्यत्क्ष शिवजी पर गदा से प्रहार करने की वजह से भीम बहुत दुःखी हुए तथा भोलेभंडारी शिव से क्षमा याचना माँगी तथा उनकी पीठ की घी से मालिश किये। आज भी केदार नाथ में पानी से अभिषेक करने के बजाय घी से अभिषेक किया जाता है। केदार नामक हिमालय चोटी पर स्थित होने के कारण इस ज्योर्तिलिंग को केदारेश्वर ज्योर्तिलिंग के रूप में पूजा जाता है।
केदारनाथ मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर बङे पत्थरों से बना मंदिर है। ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार 1019 में राजा भोज ने इसे बनवाया था। 1800 में अहिल्लयाबाई होल्कर ने इसका जिर्णोद्वार करवाकर मंदिर पर स्वर्ण कलश स्थापित करवाया। मंदिर के सभामंडप में नंदी, पांडव, द्रोपदी, कुंती तथा कृष्ण भगवान की मूर्तियां भी स्थापित हैं। ज्योर्तलिंग का आकार त्रीकोंणिय होने के कारण इस पर जालाभीषेक नहीं किया जाता। केदार नाथ की प्रातः कालीन पूजा को निर्वाण दर्शन कहा जाता है तथा सांयकालीन पूजा को शृगांरदर्शन कहा जाता है। केदारनाथ धाम की महिमा का वर्णन गरुण पुराण,  शिव पुराण, सौर पुराण तथा पद्म पुराण आदि में वर्णित किया गया है। कार्तिक मास में जब जोर की हिम वर्षा होती है तो श्री केदारेश्वर का भोगसिंहासन निकालकर मंदिर का द्वार बंद कर दिया जाता है। चैत्र मास तक केदारनाथ जी का निवास उखीमठ में होता है।

वर्ष 2013 में आई प्राकृतिक सुनामी में जहां संपूर्ण बस्ती का विनाश हो गया वहीं केदार नाथ मंदिर का सुरक्षित रहना ईश्वरीय चमत्कार ही है। शिव की अद्भुत महिमा का ऐसा असर हुआ कि एक चट्टान पता नहीं कहाँ से आकर मंदिर के लिए सुरक्षा कवच बन गई। इस रहस्य की गुत्थी विज्ञान भी सुलझाने में असर्मथ है। गौरी कुण्ड में भी केवल माता भगवती का मंदिर, सुरक्षित बचा रहना आस्था के विश्वास को और भी मजबूत करता है। सर्व शक्तिमान बाबा केदारनाथ का आशिर्वाद हम सभी पर रहे तथा विश्वास और आस्था की अलख हम सभी के मन में जलती रहे। ऐसी पवित्र मनोकामना के साथ सब मिलकर प्रेम से बोले ऊँ नमःशिवाय

मानव एकता को इंसानियत के साथ जिवंत करें

मानव एकता को इंसानियत के साथ जिवंत करें


मिलकर काम करने से बङी सी बङी चुनौतियाँ भी छोटी हो जाती हैं, इसी संदेश को जन-जन में पहुँचाने के लिए मानव एकता दिवस 24 अप्रैल को मनाया जाता है। यदि विचार करें तो आज की आधुनिक दुनिया में इस संदेश को प्रत्येक मानव को अपनाने की जरूरत है। मानवीय एकता को जिन्दा रखने के लिए मनुष्य में इंसानियत का गुण होना अति आवश्यक है। आज तो देश-दुनिया की बिगङती आवो-हवा, विकृत मानसिकता जनवरों से भी बदतर स्थिति को दर्शा रही है। जानवर भी संघटन की शक्ति को पहचानता है इसलिए समूह में रहता है परन्तु अति बुद्धीमान प्राणी इंसान स्वार्थी नेताओं के बहकावे में मानवीय एकता को कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर दिमक की तरह खोखला कर रहा है। 

दिल्ली में हुई अमानवीय घटना शायद ही कोई भूल पाया हो, असम में एक लङकी के साथ सरे आम कुछ लोग बदतमीजी कर रहे थे और लोग तमाशबीन खङे थे। बात लङकी या लङके की नही है बात है, अमानवियता की क्योंकि दरंदिगी का शिकार कोई भी कहीं भी हो सकता है। कुछ समय पूर्व एक अश्वेत छात्र को कुछ लोगों ने इतना पीटा की वो कोमा में चला गया। हाल ही में दिल्ली में एक असम के छात्र को इतना ज्यादा पीटा कि वो मर गया कोई बचाने नही आया जबकि तमाशबीन कई थे। इस तरह की वारदातें इस सच्चाई को साफ कर देती हैं कि केवल दो पाँव पर चलने वाला जीव जरूरी नही है कि मनुष्य हो क्योंकि मनुष्य तो संवेदनाओं और भावनाओं की प्रतिमूर्ती है। मानविय एकता को मजबूत करने के लिए सबसे पहले इंसानियत का पाठ आत्मसात करते हुए एक अच्छा इंसान बनना बहुत जरूरी है।
आज हम अत्याधुनिक तकनिक के जमाने में जी रहे हैं। मंगल पर घर बसाने की बात कर रहे हैं किन्तु ये बात भूल रहे हैं कि घर तो भाई-चारे से, प्यार मोहब्बत से तथा अमन चैन से बनता है।  हम मशीनी युग में जी रहे हैं, मनुष्य होने का दम भर रहे हैं परन्तु मनुष्यता से कोंसो दूर हो रहे हैं। पङौसी मुल्क के सैनिकों द्वारा धोखे से सीमा पर स्थित सैनिकों का सिर काटा जाना जबकि सैनिक तो विरता के प्रतीक होते हैं। ये बर्बरता क्या मनुष्यता को परिभाषित कर सकती है ?

आज दुनिया में महान बनने की चाहत तो हर एक में है पर पहले इंसान बनना भूल जाते हैं। एक वर्ष पूर्व केदारनाथ में आई प्राकृतिक त्रासदी से ज्यादा दुखित करने वाली इंसानी त्रासदी थी, जिसने इंसानियत को तार-तार कर दिया था। इंसानियत की सच्ची परिक्षा विषम परिस्थिती में ही होती है। सुख के समय तो हर कोई मानवता की दुहाई देता है। 

किसी ने सच कहा है कि, "इस जहाँ में कब किसी का दर्द अपनाते हैं लोग, हवा का रुख देखकर बदल जाते हैं लोग।"

ईश्वर ने मनुष्य को उसके स्वंय की शारीरिक बनावट एवं क्रियाओं से एकता का पाठ समझाया है। सभी अंगो के पारस्परिक सहयोग से ही मनुष्य क्रियाशील रहता है। प्राणी जीवन चक्र भी एक दूसरे के बिना संभव नही है, फिर भी हम मानवीय एकता को नजर अंदाज कर देते हैं। 


आज की भागम-भाग जिंदगी में कुछ इंसान ऐसे भी हैं जो इंसानियत को जिवंत करते हैं। मानवीय एकता के महत्व को प्राथमिकता देते हैं। कहते हैं "बूंद-बूंद से सागर भरता है।" इस उम्मीद के साथ भले ही मानवता दिवस महज एक दिन की ही बात क्यों न हो यदि उसे इंसानियत के साथ मनायेंगे तो हर-दिन, हर-पल मानवता का जय घोष होगा। हम सब का प्रयास यही रहे कि मानव एकता दिवस महज औपचारिकता न रहे क्योकि संघठन में ही शक्ति है।


"Where there is Unity, There is always Victory. "

Wednesday, June 18, 2014

रिश्तों का महत्व

रिश्तों का महत्व



शिशु  जन्म के साथ ही अनेक रिश्तों के बंधन में बंध जाता है और माँ-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, नाना-नानी जैसे अनेक रिश्तों को जिवंत करता है। रिश्तों के ताने-बाने से ही परिवार का निर्माण होता है। कई परिवार मिलकर समाज बनाते हैं और अनेक समाज सुमधुर रिश्तों की परंपरा को आगे बढाते हुए देश का आगाज करते हैं। सभी रिश्तों का आधार संवेदना होता है, अर्थात सम और वेदना का यानि की सुख-दुख का मिलाजुला रूप जो प्रत्येक मानव को धूप - छाँव की भावनाओं से सराबोर कर देते हैं। रक्त सम्बंधी रिश्ते तो जन्म लेते ही मनुष्य के साथ स्वतः ही जुङ जाते हैं। परन्तु कुछ रिश्ते समय के साथ अपने अस्तित्व का एहसास कराते हैं। दोस्त हो या पङौसी, सहपाठी हो या सहर्कमी तो कहीं गुरू-शिष्य का रिश्ता। रिश्तों की सरिता में सभी भावनाओं और आपसी प्रेम की धारा में बहते हैं। अपनेपन की यही धारा इंसान के जीवन को सबल और यथार्त बनाती है, वरना अकेले इंसान का जीवित रहना भी संभव नही है। सुमधुर रिश्ते ही इंसानियत के रिश्ते का शंखनाद करते हैं।

इंसानी दुनिया में एक दूसरे के साथ जुङाव का एहसास ही रिश्ता है, बस उसका नाम अलग-अलग होता है। समय के साथ एक वृक्ष की तरह रिश्तों को भी संयम, सहिष्णुता तथा आत्मियता रूपी खाद पानी की आवश्यकता होती है। परन्तु आज की आधुनिक शैली में तेज रफ्तार से दौङती जिंदगी में बहुमुल्य रिश्ते कहीं पीछे छुटते जा रहे हैं। Be  PRACTICAL की वकालत करने वाले लोगों के लिए रिश्तों की परिभाषा ही बदल गई है। उनके लिए तो न बाप बङा न भैया सबसे बङा रूपया हो गया है।

किसी भी रिश्ते में धूप-छाँव का होना सहज प्रक्रिया है किन्तु कुछ रिश्ते तो बरसाती मेंढक की तरह होते हैं, वो तभी तक आपसे रिश्ता रखते हैं जबतक उनको आपसे काम है या आपके पास पैसा है।  उनकी डिक्शनरी में भावनाओं और संवेदनाओं जैसा कोई शब्द नही होता। ऐसे रिश्ते मतलब निकल जाने पर इसतरह गायब हो जाते हैं, जैसे गधे के सर से सिंग। परन्तु कुछ लोग अनजाने में ही इस तरह के रिश्तों से इस तरह जुङ जाते हैं कि उसके टूटने पर अवसाद में भी चले जाते हैं। कुछ लोग रिश्तों की अनबन को अपने मन में ऐसे बसा लेते हैं जैसे बहुमुल्य पदार्थ हो। मनोवैज्ञानिक मैथ्यु सेक्सटॉन कहते हैं किः-   इंसानी प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य, रिश्तों की खटास और पीढा को  अपने जेहन में रखता है और उसका पोषण करता है। जिसका मनुष्य के स्वास्थ पर बुरा असर पङता है। इस तरह की नकारात्मक यादें तनाव बढाती हैं। तनाव से शरीर में 'कार्टीसोल' नामक हार्मोन स्रावित होता है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की क्षमता को कम करता है। परिणाम स्वरूप मनुष्य कई बिमारियों से ग्रसित हो जाता है।  युवावर्ग को खासतौर से ऐसे रिश्तों से परहेज करना चाहिए जो अकेलेपन और स्वार्थ भावनाओं की बुनियाद पर बनते हैं क्योंकि ऐसे रिश्ते दुःख और तनाव के साथ कुंठा को भी जन्म देते हैं।

 स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है किः- "जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नही है,  पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना जरूरी है।"

रिश्तों का जिक्र हो और पति-पत्नी के रिश्तों की बात न हो ये संभव नही है क्योंकि ये रिश्ता तो पूरे परिवार की मधुरता का आधार होता है। इस रिश्ते की मिठास और खटास दोनो का ही असर बच्चों पर पङता है।  कई बार ऐसा होता है कि, छोटी-छोटी नासमझी  रिश्ते को कसैला बना देती है। जबकि पति-पत्नी का रिश्ता एक नाजुक पक्षी की तरह  अति संवेदनशील होता है। जिसे अगर जोर से पकङो तो मर जाता है, धीरे से पकङो अर्थात उपेक्षित करो तो दूर हो जाता है। लेकिन यदि प्यार और विश्वास से पकङो तो उम्रभर साथ रहता है।

कई बार आपसी रिश्ते जरा सी अनबन और झुठे अंहकार की वजह से क्रोध की अग्नी में स्वाह हो जाते हैं। रिश्तों से ज्यादा उम्मीदें और नासमझी से हम में से कुछ लोग अपने रिश्तेदारों से बात करना बंद कर देते हैं। जिससे दूरियां इतनी बढ जाती है कि हमारे अपने हम सबसे इतनी दूर आसमानी सितारों में विलीन हो जाते हैं कि हम चाहकर भी उन्हे धरातल पर नही ला सकते और पछतावे के सिवाय कुछ भी हाँथ नही आता। 

किसी ने बहुत सही कहा हैः-  "यदि आपको किसी के साथ उम्रभर रिश्ता निभाना है तो, अपने दिल में एक कब्रिस्तान बना लेना चाहिए। जहाँ सामने वाले की गलतियों को दफनाया जा सके।" 

कोई भी रिश्ता आपसी समझदारी और निःस्वार्थ भावना के साथ परस्पर प्रेम से ही कामयाब होता है। यदि रिश्तों में आपसी सौहार्द न मिटने वाले एहसास की तरह होता है तो, छोटी सी जिंदगी भी लंबी हो जाती है। इंसानियत का रिश्ता यदि खुशहाल होगा तो देश में अमन-चैन तथा भाई-चारे की फिजा महकने लगेगी। विश्वास और अपनेपन की मिठास से रिश्तों के महत्व को आज भी जीवित रखा जा सकता है। वरना गलत फहमी और नासमझी से हम लोग, सब रिश्ते एक दिन ये सोचकर खो देंगे कि वो मुझे याद नही करते तो मैं क्यों करूं.......................


                                        "कोई टूटे तो उसे सजाना सिखो,
                                          कोई रूठे तो उसे मनाना सिखो,
                                          रिश्ते तो मिलते हैं मुकद्दर से,
                                           बस उसे खूबसूरती से निभाना सिखो।" 


Monday, June 16, 2014

बदलता बचपन जिम्मेदार कौन????


बचपन की बात करते ही एक ऐसा चेहरा नजर आता है जिसमें मस्ति, खुशी, बेफ्रिक और मासूमियत झलकती थी, जिसे देखकर उनकी भूलों को माफ कर दिया जाता था, किन्तु आज के परिपेक्ष में देखें तो, परिपक्व अपराधों से, कम उम्र के बच्चे इस तरह जुङे हैं कि उनकी मासुमियत नजर ही नही आती। 

आज देश में एक बङी बहस चल रही है कि नाबालिग बच्चे अपराध की तरफ क्यों बढ रहे हैं। निर्भया काण्ड हो या हाल ही में दिल्ली में एक ज्वेलर के घर में हुआ अपराध। हत्या जैसा जघन्य अपराध करने में भी आज 14-15 साल के बच्चे हिचकते नही। कहाँ गया वो मासूम बचपन ??
आर्थिक सामाजिक स्थितियों के कारण सङक पर रह रहे लावारिस बच्चे अशिक्षा एवं उचित मार्गदर्शन के अभाव में अपराधी प्रवृत्तियों के चंगुल में फंस जाते हैं। गरीबी और भूखमरी उन्हे अपराध की दुनिया का रास्ता दिखाती है। परन्तु आज स्थिती इतनी भयानक हो गई है कि शिक्षित और सभ्य कहे परिवारों के बच्चों के लिए अपराध खेल बन गया है और वे अपराधिक प्रवृत्ति के नशे में मस्त हैं। भ्रष्टव्यवस्था के कारण रसूखदारों के बच्चों को सजा का भी खौफ नही है। कई बार अभिभावकों द्वारा छोटी-छोटी गलतियाँ नजर अंदाज कर दी जाती है, यही छोटी-छोटी गलतियाँ सूरसा के मुहँ की तरह बङी हो जाती है और अभिभावकों को पछतावे के सिवाय कछ भी हाँथ नही लगता।

बच्चे हर जमाने में समझदार और चुलबुले होते हैं। आज के बच्चे ज्यादा स्टाइलिश, गुगल अपडेटेड हैं। उनके मन में वर्चुअलदुनिया बसती है। तकनिकी समझदारी का आलम ये है कि 4 से 10 साल के बच्चों के लिए मोबाइल, आईपेड और टेबलेट खिलौना बन गये हैं। गलियों में धमाल मचाने वाला नटखट बचपन, लुका-छिपी, ऊँच-नीच, हरा समंदर नीली तितली वाले खेलों को विडियो गेम का ग्रहंण लग गया है। गेम भी इस प्रकार के कि एक व्यक्ति मशीन गन से लोगों मारते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचता है। जहाँ बचपन तकनिकी के पंख लगाकर उङ रहा है, 14-17 साल के बच्चे ऐसे कई अपराधों में लिप्त पाये गये हैं जो बालिग मानसिकता को परिलाक्षित करता है। वहाँ हमारा कानून अभी भी पुरानी मासुमियत भरे बचपन के भ्रम में ही है। कम उम्र में बढती परिपक्वता कई चिन्ताओं को जन्म दे रही है।  

प्रश्न ये उठता है कि बचपन की इस बदलती और बदरंग होती तस्वीर क्या सिर्फ बच्चों द्वारा ही बनाई जा रही??? मेरा मानना है कि, बच्चो की इस बदलती दुनिया के लिए हमारी सामाजिक, आर्थिक और पूंजीवादी व्यवस्था बहुत हद तक जिम्मेदार है।

पूंजीवाद ने लिटिल वंडर को स्मार्ट उपभोक्ता में बदल दिया है। मॉल संस्कृति के ये बच्चे मेले की भीङ-भाङ से घबराते हैं। उनके लिए गंगा की घाट पर नहाना अनहाइजेनिक है और वाटरकिंगडम में नहाना प्रतिष्ठा का सूचक है। पिज्जा, बरगर को खाते हुए देशी समोसे और कचोरी को सोSSS ऑयली कह कर छोङ देते हैं।   
बच्चों का रूठना, फरमाइश करना पहले भी होता था, तब बच्चों को मनाने का तरिका दूसरा हुआ करता था। बच्चों को अच्छी शिक्षाप्रद कहानी सुनाकर या घर में कुछ स्पेशल खाने की चीज बनाकर उन्हे मनाते थे इसी में प्यार और अपनापन होता था। आज हम अभिभावक बच्चे को बहलाने के लिए सेलफोन थमा देते हैं। भाई-बहन के झगङे को निपटाने की बजाय उन्हे अलग-अलग करके एक को टीवी के आगे बैठा देते हैं और दूसरे के हाँथ में लेपटॉप थमा देते हैं। प्रतिस्पर्धा वाले बाजारवाद में चैनल की दुनिया पर क्या विश्वास किया जा सकता है? गिरते नैतिक स्तर का असर आज के टीवी कार्यक्रमों में देखा जा सकता है किन्तु, माता-पिता को इससे कोई सरोकार नही कि बच्चा क्या देख रहा है या किस तरह की भाषा सुन रहा है। बाल- मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे परिवेश का असर बच्चे पर अत्यधिक पङता है। बच्चे काल्पनिक दुनिया में जीते हैं। उसमें आधुनिकता की दुहाई देने वाले पाश्चातय संस्कृति में रंगे कार्यक्रम आग में घी का काम करते हैं।

स्वामी विवेकानंद जी का कथन हैः- बच्चों पर निवेश करने की सबसे अच्छी चीज है अपना समय और अच्छे संस्कार। ध्यान रखें, एक श्रेष्ठ बालक का निर्माण सौ विद्यालयों को बनाने से बेहतर है।

आज का बचपन पहले से मुखर और होशियार है। पहले परिवार बच्चों का मूल आधार होते थे। आज की अत्यआधुनिक एवं अपार्टमेंट लाइफ में बच्चों के मन को सींचने और पोषित करने का वक्त माता-पिता के पास नही है। दादा-दादी एंव नाना-नानी की जगह रिक्त है। सब मिलकर न चाहते हुए भी हम सब ने बच्चों की सुहानी दुनिया में काँटे बो दिये हैं। पहले खेल-खेल में एक्सरसाइज हो जाती थी और बच्चों में मिलजुलकर रहने की प्रवृत्ति का विकास होता था। आज एकल खेल बच्चों में अंर्तमुखी भावना को जागृत कर रहे हैं जिससे मासूम बच्चे अवसाद में आत्महत्या तक को अंजाम दे रहे हैं।

नेहरु जी का कथन हैः- “Children are likes buds in a garden and should be carefully and lovingly nurtured, as they are the future of the Nation and citizens tomorrow.”

सहजता बचपन का मूलर्धम है। यह वो भाव है जो बीज से पेङ बनकर समर्थ और मानवीय गुणों से युक्त व्यक्ति का निर्माण करता है। बचपन तो उस कोरी किताब की तरह है जिसपर जो चाहो लिखा जा सकता है। कहते हैं इमारत वही मजबूत होती है जिसकी नींव मजबूत हो, यही नियम बच्चों के विकास पर भी लागू होता है। अच्छे संस्कारों से बनी बचपन की नींव सभ्य और सुसंस्कृति युवा का आधार है।

आज की दुनिया उनकी स्वयं की रचाई दुनिया नही है। ये दिशाहीन  दुनिया अनियमित सामाजिक, पारीवारिक, बाजारवादी और राजनैतिक प्रक्रियाओं की उपज है। आज डोरेमॉन, नोबिता, शिनचैन और स्पाइडर मैन देखकर बच्चे एंग्री बर्डस तो बन सकते हैं। परन्तु रविन्द्र नाथ की मिनी या चेखव नही बन सकते।  

डॉ. कलाम का कहना है कि, जब माता-पिता अपने बच्चे को विभिन्न चरणों में शक्तिशाली बनाते हैं, तो बच्चा जिम्मेदार नागरिक बनता है। जब एक शिक्षक को ज्ञान और अनुभव से शक्ति-संपन्न बनाया जाता है तो छात्र आगे चलकर योग्य युवा बनता है, जो राष्ट्र एवं परिवार के हित में कार्य करता है।“   

आज समय की माँग है कि, दोषारोपण करने की बजाय हम सब मिलकर हर बच्चे को उसका बचपन लौटाएं, मिलकर एक बेहतर कल बनायें।

“The Greatest gifts you can give your children are the roots of responsibility and the wings of Independence.”